Wednesday, 7 April 2010

क़ुरआन -- सूरह तौबः ९



सूरह तौबह --९
Repentance --9
E


इस्लाम के दूत मुहम्मद को जब पहली आकाश वाणी (वही या निदा) आई तो वह गारे-हिरा में मसरूफे-इबादत थे. वह कहते हैं कि जिब्रील फ़रिश्ता आया और उसने उनको दबोच लिया, फिर छोड़ कर बोला ''पढ़'' (न उसके हाथ में कोई तख्ती थीं, न किताब, न कापी, न कोई तहरीर, अजीब जंगली जीव था फ़रिश्ता, बगैर लिखा दिखलाए पढने को कह रहा था.)
''मुहम्मद बिना तहरीर देखे ही दुहाई देने लगे कि ''मैं अनपढ़ हूँ.''
असभ्य और घामड़ फ़रिश्ते ने फिर मुहम्मद को दबोच लिया और छोड़ते हुए कहा ''पढ़''
''अजीब अहमक मखलूक आसमान से नाज़िल हुए है आप, हवा में क्या लिखा है जिसे देख कर मैं बतलाऊँ 'बे से बकरी होगी.' अरे पहेलवान ज़मीन पर ही कुछ लिखो तो मुझ से पढने को कहो '' ऐसा मुहम्मद ने नहीं कहा, उनको ऐसा कहना चाहिए था. उन्हों ने फिर कहा ''मैं अनपढ़ हूँ.''
फ़रिश्ते ने फिर मुहम्मद को दबोचा, छोड़ा, अपनी ग़ैर इंसानी हरकत दोहराया, आखिर इंसानी क़दरों से वाक़िफ जो न था, मुहम्मद के साथ गुस्ताखाना रवय्या अख्तियार किए था जिनको अल्लाह तअला भी ''जनाब फरमा दीजिए - - - करके बात करता है ... खैर तीन बार बगैर किसी लिखी इबारत के दबोच दबोच कर वह मुहम्मद को पढ़ाता रहा.
चौथी बार ईश वाणी जो उसने मुहम्मद को पहुंचाई उसकी हकीकत को देखिए - - -
''पढो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया इंसान को. इंसान को लोथड़े से पैदा किया. पढो और तुम्हारा रब निहायत करीम है.''
ईश्वर की इस वाणी में खुद ईश्वर अपनी कुदरत का ज्ञान नहीं रखता. मुहम्मद ने क़ब्ल अज़ वक़्त गिरे हमल को कहीं देखा या सुन रखा होगा और उस लोथड़े को इन्सान के तामीर की बुनियाद बना दिया है, जैसे आगे कुरान में कहेंगे कि आदमी उछालते हुए पानी से पैदा हुवा है.
पच्चीस साल की उम्र तक बकरियाँ चरा कर पेट पालने वाला गुमनाम गडरिया एक बार बारह साल की उम्र में चाचा के साथ तिजारत के सफ़र में गया जिसे बीच रस्ते से ही नाकारह जान कर वापस लौटा दिया गया, फिर मक्का वालों की बकरियाँ चराने लगा, मालदार खदीजा को सीधे सादे गुलाम नुमा शौहर की ज़रूरत थी और सललल्लाहोअलैहेवसल्लम को मुफ्त रोटी तोड़ने की. जब मुफ़्त रोटियों का इंतेज़ाम हो गया तो ग़ारे-हिरा में बैठ कर पैगम्बरी के ख्वाब देखने लगे. अल्लाह बन कर इन्सान कि ईजाद की खबर देने लगे.अल्लाह ने कैसी बेहूदा खबर दी है अपने प्यारे रसूल को. चौदह सौ सालों से लाखों ओलिमा इस पर सर धुनें जा रहे हैं, करोरों कुरान और हदीसें इस खबर पर छप चुकी होंगी।


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आइए अब चलें मैदाने-जेहाद में जहाँ मुहम्मदी अल्लाह तालिबानियों को ट्रेनिग दे रहा है और दुनिया खड़ी तमाशा देख रही है क्यूंकि दुन्या के हर धर्म इन्सान को इन्सान से नफ़रत सिखलाते है. मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना'' दुन्या का सबसे बड़ा झूट।



मुनाफ़िक़ वह लोग हुवा करते थे जो मुहम्मदी तहरीक में अपनी अक्ल का दख्ल भी रखते थे, आँख बंद कर के मुहम्मद की हाँ में हाँ नहीं मिलाया करते थे, मुहम्मद की जिहालत और ला इल्मी पर मुस्कुरा दिया करते थे और उनको टोक कर बात की इस्लाह कर दिया करते थे. बस ऐसे मुसलमान हुए लोगों से बजाए इसके कि खुदसर मुहम्मद उनके मशविरों का कुछ फ़ायदा उठाएँ, सीधे उनको जहन्नमी कह दिया करते थे. काफ़िर तो खुले मुखालिफ थे ही, उनसे जेहाद का एलान था मगर यह मुनाफ़िक़ जो छिपे हुए दुश्मन थे वह हमेशा मुहम्मद के लिए सर दर्द रहे. यह अक्सर समझदार, तालीम याफ्ता और साफिबे हैसियत हुवा करते थे. होशियार मुहम्मद को डर लगा रहता कि कही इन में से कोई इन से आगे न हो जाए और इनकी पयंबरी झटक न ले, इस लिए क़ुरआन में इन को कोसते काटते ही इन की कटी.
मुहम्मद का क़ुरआनी अंदाज़-ए-बयान एक यह भी है कि उनकी बात न मानने वाला सब से बड़ा ज़ालिम होता है, अक्सर क़ुरआन में यह जुमला आता है '' उससे बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूट बांधता हो?'' किसी बात को न मानना ज़ुल्म कहाँ ठहरा बात को ज़बरदस्ती मनवाना ज़रूर ज़ुल्म है। जैसा कि इस्लाम जेहादी तशद्दुद से खुद को मनवाता है.

सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (६५-६९)
''क्या इन लोगों को इस उन की खबर नहीं पहुँची जो इन लोगों से पहले हुए जैसे कौम नूह, कौम आद, कौम समूद और कौम इब्राहीम और अहले मुदीन और उलटी हुई बस्तियाँ कि इन के पास इनके पयम्बर साफ़ निशानियाँ लेकर आए, सो अल्लाह तअला ने इन पर ज़ुल्म नहीं किया लेकिन वह खुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते थे.''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (७०)
इन उलटी हुई बस्तियों की कहानियां तौरेत में ऐसी हुआ करती हैं कि ज़ालिम और जाबिर मूसा जब मिस्र से यहूदियों को लेकर एक फरेब के साथ मिस्रियों को लूट कर फरार हुवा तो बियाबान जंगल में पनाह गुज़ीन हुवा जहाँ मन्ना और बटेरों पर बीस साल तक गुज़ारा किया.बीस साल बाद जब नई नस्ल की फ़ौज तैयार करली तो इर्द गिर्द के मुकामी बाशिंदों पर जो कि उमूमन फ़िलिस्ती हुआ करते थे, हमला शुरू कर दिया. मूसा का तरीका होता कि बस्ती में जवान मर्द औरत ही नहीं बूढ़े और बच्चे भी तहे-तेग कर दिए जाते थे, हत्ता कि कोई जानवर भी जिंदा न बचता था. उसके बाद बस्ती को आग से तबाह करके उस पर दो यहूदी सिपाहियों का पहरा हमेशा हमेशा के लिए बिठा दिया जाता था कि बस्ती दोबारा आबाद न होने पाए..यह बातें तौरेत में (old testament ) में रोज़े रौशन की तरह देखी जा सकती हैं. उम्मी मुहम्मद अपने गढ़े हुए पयम्बरों की यही निशानियाँ क़ुरआन में बार बार गिनवा रहे हैं. इन्हीं बस्तियों में कौम नूह, कौम आद, कौम समूद और कौम इब्राहीम की नस्लें भी बसा करती थीं.
मुहम्मद ने बनी नुज़ैर की बस्ती को मूसा की तर्ज़ पर ही बर्बाद करने की कोशश की थी जिस पर खुद उनके खिलाफ उनके खेमे से ही आवाज़ बुलंद हुई और उनको अल्लाह की वही के नुजूल का सहारा लेना पड़ा. कि बनी नुज़ैर के बागात को जड़ से कटवा देना और उनके घरों में आग खुद उनके हाथों से लगवाना अल्लाह का हुक्म था.
''ए नबी! कुफ्फर और मुनाफिकीन से जेहाद कीजिए और उन पर सख्ती कीजिए, उनका ठिकाना दोज़ख है और वह बुरी जगह है. वह लोग कसमें खा जाते हैं कि हम ने नहीं कही हाँला की उन्हों ने कुफ्र की बात कही थी और अपने इस्लाम के बाद काफ़िर हो गए.- - -सो अगर तौबा करले तो बेहतर होगा और अगर रू गरदनी की तो अल्लाह तअला उनको दुन्या और आखरत में दर्द नाक सजा देगा और इनका दुन्या में कौई यार होगा न मददगार.''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (७२-७४)
मुहम्मद का अल्लाह डरा रहा है, धमका रहा है, फुसला रहा है और बहला रहा है हालाँकि वह चाहे तो दम भर में लोगों के दिलों को मोम करके अपने इस्लाम कि बाती जला दे मगर मुहम्मद के साथ रिआयत है कि उनकी पैगम्बरी का सवाल है और कुरैशियों की रोज़ी रोटी का।



शर्री मुहम्मद के सर में शर अल्लाह के नाम पर जेहाद बन कर समा गया था. आगे क़ुरआनी आयतें इन्हीं शर्री बहसों को लिए हुए चलती हैं, जेहाद मस्जिद में बैठे हुए समझदार मुनाफ़िक़ से, जेहाद पड़ोस में रहने वाले ग़ैरत मंद मुनकिर से, जेहाद, मोहल्ले में रहने वाले ज़हीन काफ़िर से, जेहाद बस्ती के क़दीमी बाशिंदे मुशरिक से, जेहाद साहबे किताब ईसाइयों से, जेहाद साहिबे ईमान और साहिबे रसूल मूसाइयों से। इतना ही नहीं जो मुसलमान गलती से इस्लाम कुबूल कर चुका है उसकी मुसीबत दोगुनी हो गई थी. अपनी मेहनत और मशक्क़त से अगर उसने अपनी कुछ हैसियत बनाई है तो वह भी मुहम्मद की आँखों में चुभती है, वस चाहते हैं कि वह अपना माल अल्लाह के हवाले करे और गायबाना अल्लाह बने बैठे हैं जनाब खुद.
मुहम्मद कुरआन में मुसलमानों को समझाते हैं कि बद अह्द लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह अगर उन्हें माल ओ मतअ से नवाज़े तो बदले में वह अल्लाह के नाम पर खूब खर्च करेंगे और जब भोंदू अल्लाह उनके झाँसे में आ जाता है और उनको माल,टाल से भर देता है तो वह अल्लाह को ठेंगा दिखला देते हैं. मुहम्मद कहते हैं हालाँकि अल्लाह गैब दान है और ऐसे लोग ही जहन्नम रसीदा होंगे.
२५ साल तक बकरियाँ चराने वाला और उसके बाद जोरू माता की गुलामी में रह कर मुफ्त रोटी तोड़ने वाला कठ मुल्ला मुसलामानों को ऐसी तिकड़म भरी कुरआन के सिवा और क्या दे सकता है?

सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (७५ -८१)
''और इनमें (जेहाद से गुरेज़ करने वालों) से अगर कोई मर जाए तो उस पर कभी नमाज़ मत पढ़ें, न उसके कब्र पर कभी खड़े होएँ क्यूं कि उसने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ्र किया और यह हालाते कुफ्र में मरे. हैं''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (८४)
इब्नुल वक़्त (समय के संतान) ओलिमा और नेता यह कहते हुए नहीं थकते कि इस्लाम मेल मोहब्बत, अख्वत और सद भाव सिखलता है, आप देख रहे हैं कि इस्लाम जिन्दा तो जिन्दा मुर्दे से भी नफरत सिखलाता है. कम लोगों को मालूम है कि चौथे खलीफा उस्मान गनी मरने के बाद इसी नफ़रत के शिकार हो गए थे, उनकी लाश तीन दिनों तक सडती रही, बाद में यहूदियों ने अज़ राहे इंसानियत उसको अपने कब्रिस्तान में दफ़न किया।


'' और जब कोई टुकड़ा कुरआन का नाजिल किया जाता है कि तुम अल्लाह पर ईमान लाओ और इस के रसूल के हमराह होकर जेहाद करो तो इनमें से मकदूर वाले आप से रुखसतमाँगते हैं और कहते हैं हमको इजाज़त दीजिए कि हम भी यहाँ ठहेरने वालों के साथ हो जाएँ.''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (८६)
सूरह तौबह में अल्लाह ने इंसानी खून ख़राबे से तौबः किया है तभी तो अपने नाम से सूरह को शुरू करने की इजाज़त नहीं दी. मुहम्मद कहते हैं '' और जब कोई टुकड़ा कुरआन का नाज़िल किया जाता है कि - - - '' बाकी सब कुरआन तो मुहम्मद की बकवास है. मुसलमानों को कैसे समझाया जाए कि कुरआन उनको गुमराह किए हुए है.
मुहम्मद अपनी जुबान को उस खुदाए बरतर के कन्धों पर रख कर कैसी ओछी ओछी बातें कर राहे हैं- - -
''वह लोग खाना नशीन औरतों के साथ रहने पर राज़ी हो गए. इनके दिलों पर मोहर लग गई जिसको वह समझते ही नहीं.''
सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (८७)
समझने तो नहीं देते ये माहिरे कुरआन मुल्ला और मोलवी जो इसको वास्ते तिलावत ही महफूज़ किए हुए हैं, समझने समझाने को मन करते हैं.
मुहम्मद की जेहादी तिजारत और उसके फायदों की शोहरत देहातों में दूर दूर तक फ़ैल गई है. बेरोज़गार नवजवान में उनकी लूट में मिलने वाले माले ग़नीमत की बरकतें गाँव के फिजा को महका रही हैं, गंवार रालें टपकते हुए जूक दर जूक मदीने भागे चले आ राहे हैं.मुहम्मद को यह घाटे का सौदा गवारा नहीं हाँला कि देहाती पत्थर के बुतों को तर्क करके हवाई बुत अल्लाह वाहिद को पूजने पर राज़ी हैं मगर मुहम्मद को इन खाली हाथ आने वाले मुसलामानों की कोई ज़रुरत नहीं. मुहम्मद को जेहाद के लिए पहले माल चाहिए बाद में जान, अगर बच गए तो अल्लाह का मुक़द्दमा कि उसको देखना बाकी रह जायगा कि जेहादी ने दिल से जेहाद किया या बे दिली से. इन देहातियों को तो फ़ौज में भारती चाहिए वह भी गुज़ारा भत्ता एडवांस में.कहाँ तो अल्लाह ने एक नबीना से बे इल्तेफाती पर मुहम्मद को फटकार लगाई थी और आज जुज़ामियों को बाहर से ही कहला देते हैं कि वापस जाओ कि समझो तुमसे बैत (हाथ पर हाथ देकर दीक्षा लेना)कर लिया. यह पैगम्बर थे या छुवा छूतकी बीमारी।


'' निसार-उल-ईमान''

ऐतिहासिक सत्य में क़ुरआन की हक़ीक़त
Muhammad, like all insecure men, was obsessed with rejection. Even after eliminating the Jews, his only literate foe, Arabs continued to be repulsed. Twenty years after the first cave-vision, Muhammad couldn't sell Islam on its merits. Qur'an 9:66 "Make no excuses: you have rejected Faith after you had accepted it. If We pardon some of you, We will punish others amongst you, for they are disbelievers." Any free and enlightened man or woman exposed to Islam will reject it as did most of those who lived in the prophet's presence. That is why Muhammad had to make rejecting Islam a capital offense.
And it remains so to this day. This news report from WorldNetDaily confirms what happens to Muslims who reject Islam. "Dateline Jerusalem, 2003: After slaughtering a Muslim-turned-Christian, Islamic extremists returned the man's body to his Palestinian family in four pieces. The newly converted man left his friends and family earlier this month bound for a mountainous region of the Palestinian Authority. He took Christian material with him - tapes and a Bible. Ten days later, the body of the man, who left behind a wife and two small children, was returned to his home, having been cut into four pieces. The family believes the act was meant a warning to other Muslims who might consider becoming Christians. Under Muslim Sharia law, any male who leaves Islam faces the death penalty. The terror group Hamas receives funding from Iran specifically for this purpose."
Returning to the surah, we find Muhammad attacking his renegades just as today's Muslims are doing. It's hard to imagine the percentage who must have rejected Muhammad and Islam for the Qur'an to focus so intently on them. Qur'an 9:67 "The Hypocrites, men and women, (have an understanding) with each other. They enjoin what is forbidden, and forbid what Islam commands. They withhold their hands (from spending in Allah's Cause [Jihad]). They have forgotten Allah so He has forgotten them. Verily the Hypocrites are oblivious, rebellious and perverse." Allah is a very vindictive and nasty spirit. Peaceful Muslims who aren't willing to fund Jihad and terrorize infidels are called "perverse."
Again: Qur'an 9:68 "Allah has promised the Hypocrites, both men and women, and the disbelievers the Fire of Hell for their abode: Therein shall they dwell. It will suffice them. On them is the curse of Allah, and an enduring punishment, a lasting torment." Fair warning: if you are a peaceful Muslim, your god hates you.
After condemning the vain discourse of those who were not swallowing Muhammad's poison, Allah reprises a worn-out trick: Qur'an 9:70 "Has not the story reached them of those before them - the People of Noah, Ad, and Thamud; the folk of Abraham, the men of Midian, and the cities overthrown. To them came their messengers with signs of proof. It is not Allah Who wrongs them, but they wrong their own souls." It's been a long time since Muhammad has corrupted a Bible or Hanif story to scare the faithful, but he hasn't forgotten how.
Now that the Islamic god is in the mode of pulverizing "bad" Muslims into submission (a.k.a. Islam), it's time for him to define "good Muslim" and tell them how to behave. Qur'an 9:71 "The Believers, men and women, are guardians of one another: they enjoin what Islam (orders them to do) and forbid disbelief [confirming there was no choice]. They perform their devotional obligations [an oxymoron], pay the zakat, and obey Allah and His Messenger." Qur'an 9:71 "O Prophet, strive hard [fighting] against the unbelievers and the Hypocrites, and be harsh with them. Their abode is Hell, an evil refuge indeed." Islam can thus be defined as: perform, pay, obey, and fight.
Transfixed by the number of Muslims rejecting Muhammad, ritual, taxes, jihad, and piracy, Team Islam said. Qur'an 9:74 "They swear by Allah that they said nothing, but indeed they uttered blasphemy, and they disbelieved after Surrender (accepting Islam). They meditated a plot (to murder Prophet Muhammad) which they were unable to carry out. The reason for this revenge of theirs was the bounty [of booty] with which Allah and His Messenger had enriched them! If they repent, it will be best for them; but if they turn back, Allah will punish them with a grievous torment in this life and in the Hereafter." While the Hadith doesn't describe the Muslim plot to kill Muhammad, the Qur'an says the motive was money.
It got to the point Muhammad couldn't even bribe his mercenaries: Qur'an 9:75 "Amongst them are men who made a deal with Allah, that if He bestowed on them of His bounty [booty], they would pay (largely) in zakat tax (for Allah's Cause [Jihad]). But when He did bestow of His bounty, they became niggardly, and turned back (from their bargain), averse (refusing to pay)." All Muhammad really wanted was money. So long as he stole enough, he could buy sex, power, and praise.
But the Muslim militants were as miserly as the man who had beguiled them. So the warlord said that their hypocrisy was a miracle ordained by god: Qur'an 9:77 "He punished them by putting hypocrisy in their hearts until the Day whereon they shall meet Him, because they lied to Allah and failed to perform as promised [forking over the dough]. Allah knows their secrets. Those who slander and taunt the believers who pay the zakat (for Allah's Cause) voluntarily and throw ridicule on them, scoffing, Allah will throw back their taunts, and they shall have a painful doom. Whether you ask for their forgiveness or not, (their sin is unforgivable). If you ask seventy times for their forgiveness Allah will not forgive them because they have disbelieved Allah and His Messenger." Islam's "unforgivable" sin is: "Not paying Muhammad the money."
In another translation, Allah confirms that hypocrisy is his fault and that it's the result of a business deal gone bad: Qur'an 9:75 "Some of you made a deal with Allah, saying, 'If You give us booty we shall pay You the tax.' But when He gave them booty, they became greedy and refused to pay. As a consequence of breaking their promises, Allah filled their hearts with hypocrisy which will last forever." Lest we forget, the business of Allah was terrorism, piracy, and the slave trade.
The broken record that became the Qur'an screeches once again: peaceful Muslims go to hell because they are reluctant to fight. Qur'an 9:81 "Those who stayed behind (in the Tabuk expedition) rejoiced in their inaction behind the back of the Messenger. They hated to strive and fight with their goods and lives in the Cause of Allah. They said, 'Go not forth in the heat.' Say, 'The fire of Hell is fiercer in heat.' If only they could understand! So let them laugh a little, for they will weep much as a reward for what they did. If Allah brings you back (from the campaign) to a party of the hypocrites and they ask to go out to fight, say: 'You shall never go out to fight with me against a foe. You were content sitting inactive on the first occasion. So sit with the useless men who lag behind.' Do not pray for any of them (Muhammad) that die, nor stand at his grave. They rejected Allah and disbelieved His Messenger. They died in a state of perverse rebellion." Allah - Oft-Forgiving, Ever-Merciful - isn't being very nice to people.
Muhammad hated Christians and Jews less than he loathed peace-loving Muslims. He was so irritated that they were able to make more money than his militants were able to steal , he repeated the 55th verse.
Qur'an 9:85 "And let not their wealth or (following in) sons dazzle you or excite your admiration. Allah's plan is to punish them with these things in this world, and to make sure their souls perish while they are unbelievers. When a surah comes down enjoining them to believe in Allah and to strive hard and fight along with His Messenger, those with wealth and influence among them ask you for exemption from Jihad. They prefer to be with (their women), who remain behind (at home). Their hearts are sealed and so they understand not." Muhammad stayed behind at home with his harem on fifty of the seventy-five raids he initiated; so he, too, was a hypocrite - the biggest of them all.
Throughout this surah Allah, acting like Lucifer, has said that he wanted people to die as disbelievers so that he could torture them. He claimed to have sealed their hearts and caused their hypocrisy (unwillingness to perform, pay, obey, and fight). But if that's the case, why is the Qur'an so intent on threatening them? Why not just leave them alone and press on with the good militants?
Prophet of Doom

6 comments:

  1. Although I am unable to understand whole things as you mentioned here. But I feel this line in today's context धर्म(Not "Dharma") सम्प्रदाय/पंथ इन्सान को इन्सान से नफ़रत सिखलाते है.
    I feel immensely that there is no need of religious book . It is essential to belief on country law(which is based on equality/humanity) and moral education for any citizen.

    -sulabh

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  3. मामा का अनुवाद चाचा की नकल कब तक करोगे आओ

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    विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
    (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
    antimawtar.blogspot.com (Rank-2 Blog) डायरेक्‍ट लिंक

    अल्‍लाह का
    चैलेंज पूरी मानव-जाति को


    अल्‍लाह का
    चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता


    अल्‍लाह का
    चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं


    अल्‍लाह का
    चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार


    अल्‍लाह का
    चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में


    अल्‍लाह
    का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी


    छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
    islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)
    डायरेक्‍ट लिंक

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  4. भारत के विनाश और पतन का कारण केवल ब्राह्मण हैं। मेरे लेखों से यह सच्चाई उजागर होते देखकर जनाब बी. एन. शर्मा परेशान हो गये और किसी मत में विश्वास न रखने के बावजूद वे ब्राह्मणी मायाजाल की रक्षा में कमर कसकर मैदान में कूद गये। उन्होंने इस्लाम के बारे में जो कुछ भी कहा वह केवल इसलिये ताकि लोग इस्लाम के नियमों को मानकर ब्राह्मणी मायाजाल से मुक्त न हो जाएं।
    इस्लाम के युद्धों में कमियां निकालने वालों को डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ का यह लेख देखना चाहिये।
    क्या वेद अहिंसावादी हैं ? - डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ The True Hindu
    नीचे इंद्र और उसके युद्धों का वर्णन करने वाले कुछ मंत्र प्रस्तुत हैं :

    त्वमेतात्र् जनराज्ञो द्विदशाबंधुना सुश्रवसोपजग्मुषः ,
    षष्टिं सहसा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्
    ( ऋग्वेद , 1-53-9 )
    अर्थात हे इंद्र , सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए आए 20 राजाओं और उनके 60,099 अनुचरों को तुमने पराजित कर दिया था ।

    इंद्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः जघान नवतीर्नव ।
    ( ऋग्वेद , 1-84-13 )
    अर्थात अ-प्रतिद्वंदी इंद्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वृत्र आदि असुरों को 8-10 बार नष्ट किया ।

    अहन् इंद्रो अदहद् अग्निः इंद्रो पुरा दस्यून मध्यन्दिनादभीके ।
    दुर्गे दुरोणे क्रत्वा न यातां पुरू सहस्रा शर्वा नि बर्हीत्
    ( ऋग्वेद , 4-28-3 )
    अर्थात हे सोम , तुझे पी कर बलवान हुए इंद्र ने दोपहर में ही शत्रुओं को मार डाला था और अग्नि ने भी कितने ही शत्रुओं को जला दिया था । जैसे किसी असुरक्षित स्थान में जाने वाले व्यक्ति को चोर मार डालता है , उसी प्रकार इंद्र ने हज़ारों सेनाओं का वध किया है ।

    अस्वापयद् दभीयते सहस्रा त्रिंशतं हथैः, दासानिमिंद्रो मायया ।
    ( ऋग्वेद , 4-30-21 )
    अर्थात इंद्र ने अपने कृपा पात्र दभीति के लिए अपनी शक्ति से 30 हज़ार राक्षसों को अपने घातक आयुधों से मार डाला ।

    नव यदस्य नवतिं च भोगान् साकं वज्रेण मधवा विवृश्चत्,
    अर्चंतींद्र मरूतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम ।
    ( ऋग्वेद , 5-29-6 )
    अर्थात इंद्र ने वज्र से शंबर के 99 नगरों को एक साथ नष्ट कर दिया । तब संग्राम भूमि में ही मरूतों ने त्रिष्टुप छंद में इंद्र की स्तुति की । तब जोश में आकर इंद्र ने वज्र से शंबर को पीड़ित किया था ।

    नि गव्यवो दुह्यवश्च पष्टिः शता सुषुपुः षट् सहसा
    षष्टिर्वीरासो अधि षट् दुवोयु विश्वेदिंद्रस्य वीर्या कृतानि
    ( ऋग्वेद , 7-18-14 )
    अर्थात अनु और दुहयु की गौओं को चाहने वाले 66,066 संबंधियों को सेवाभिलाषी सुदास के लिए मारा गया था । ये सब कार्य इंद्र की शूरता के सूचक हैं ।
    वेदों में युद्ध के लिए युद्ध करना बड़े बड़े यज्ञ करने से भी ज़्यादा पुण्यकारी माना गया है । आज तक जहां कहीं यज्ञ होता है , उस के अंत में निम्नलिखित शलोक पढ़ा जाता है ।
    अर्थात अनेक यज्ञ , कठिन तप कर के और अनेक सुपात्रों को दान दे कर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं , अपने जातिधर्म का पालन करते हुए युद्धक्षेत्र में प्राण त्यागने वाले शूरवीर क्षत्रिय उस से भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं ।
    http://vedquran.blogspot.com/2010/04/true-hindu.html

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