Friday, 7 May 2010

क़ुरआन- सूरह हूद-- ११



सूरह हूद-११
(दूसरी किस्त)

मोमिन बनाम मुस्लिम

मुसलामानों खुद को बदलो. बिना खुद को बदले तुम्हारी दुन्या नहीं बदल सकती. तुमको मुस्लिम से मोमिन बनना है. तुम अच्छे मुस्लिम तो ज़रूर हो सकते हो मगर मोमिन क़तई नहीं, इस बारीकी को समझने के बाद तुम्हारी कायनात बदल सकती है. मुस्लिम इस्लाम कुबूल करने के बाद ''लाइलाहाइल्लिल्लाह मुहम्मदुर रसूल लिल्लाह'' यानि अल्लाह वाहिद के सिवा कोई अल्लाह नहीं और मुहम्मद उसके पयम्बर हैं. मोमिन फ़ितरी यानी कुदरती रद्दे अमल पर ईमान रखता है. ग़ैर फ़ितरी बातों पर वह यक़ीन नहीं रखता, मसलन इसका क्या सुबूत हैकि मुहम्मद को अल्लाह ने अपना पयम्बर बना कर भेजा. इस वाकेए को न किसी ने देखा न अल्लाह को पयम्बर बनाते हुए सुना. जो ऐसी बातों पर यक़ीन या अक़ीदत रखते हैं वह मुस्लिम हो सकते हैं मगर मोमिन कभी भी नहीं. मुस्लमान खुद को साहिबे ईमान कह कर आम लोगों को धोका देता है कि लोग उसे लेन देन के बारे में ईमान दार समझें, उसका ईमान तो कुछ और ही होता है, वह होता है ''लाइलाहाइल्लिल्लाह मुहम्मदुर रसूल लिल्लाह'' इसी लिए वह हर बात पर इंशा अल्लाह कहता है. यह इंशा अल्लाह उसकी वादा खिलाफ़ी, बे ईमानी, धोखा धडी और हक़ तल्फ़ी में बहुत मदद गार साबित होता है. इस्लाम जो ज़ुल्म, ज़्यादती, जंग, जूनून, जेहाद, बे ईमानी, बद फेअली, बद अक़ली और बेजा जेसरती के साथ सर सब्ज़ हुवा था, उसी का फल चखते हुए अपनी रुसवाई को देख रहा है. ऐसा भी वक्त आ सकता है कि इस्लाम इस ज़मीन पर शजर-ए-मम्नूअ बन जाय और आप के बच्चों को साबित करना पड़े कि वह मुसलमान नहीं हैं. इससे पहले तरके इस्लाम करके साहिबे ईमान बन जाओ. वह ईमान जो २+२=४ की तरह हो, जो फूल में खुशबू की तरह हो, जो इंसानी दर्द को छू सके, जो इस धरती को आने वाली नस्लों के लिए जन्नत बना सके. उस इस्लाम को खैरबाद करो जो ''लाइलाहाइल्लिल्लाह मुहम्मदुर रसूल लिल्लाह'' जैसे वह्म में तुमको जकड़े हुए है.

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दुन्या को गुमराह किए हुए सब से बड़ी किताब की तरफ चलते हैं और देखते हैं कि यह किस तरह दुन्या की २०% आबादी को पामाल और ख्वार किए हुए है और इस के खुद ग़रज़ आलिमानेदीन इसकी पर्दा पोशी कब तक करते रहेंगे - - -

''और हमारा कौल तो ये है कि हमारे माबूदों में से किसी ने आपको किसी ख़राबी में मुब्तिला कर दिया है, फ़रमाया मैं अलल एलान अल्लाह को गवाह करता हूँ और तुम को भी गवाह करता हूँ कि मैं इन चीजों से बेज़ार हूँ जिनको तुम अल्लाह का शरीक क़रार देते हो.''
सूरह हूद -११, १२-वाँ परा आयत (५४)
उनका कौल आज भी हक़ बजानिब है कि बुत अगर कुछ फ़ायदा नहीं पहुचाते तो कोई ज़रर भी नहीं, मगर अल्लाह तो बहुत ही खतरनाक साबित हुवा. गौर करें ईमान दारी से.
मुहम्मद हूद का किरदार बन कर बुत परस्तों के दरमियान इस्लाम का प्रचार कर रहे हैं. लोग पूछते हैं कि कोई ठोस दलील तो आपने पेश नहीं किया, यूँ ही आपके कहने पर अपने पूज्य को हम तर्क करने से रहे, अच्छा यही बतलाओ कि तुमको कोई इनसे नुकसान पहुँचा? किसी ने आप को ख़राबी में मुब्तिला कर दिया है? ज़रा गौर कीजिए इन माक़ूल सवालों का ग़ैर माक़ूल जवाब
''मैं अलल एलान अल्लाह को गवाह करता हूँ और तुम को भी गवाह करता हूँ कि मैं इन चीजों से बेज़ार हूँ जिनको तुम अल्लाह का शरीक क़रार देते हो.'' ज्वाला मुखी के मुँह से आग की दरिया और ग्लेशियर से बर्फ के तोदे बहाने वाली कुदरत इस किस्म की नामार्दों की बातें लेकर बैठी है। मुसलमानों आँखें खोलो. अपनी नस्लों को बचाओ मुहम्मदी फरेब से.

''सो तुम सब मिल कर मेरे साथ दाँव घात कर लो, फिर मुझको ज़रा मोहलत न दो, मैंने अपने अल्लाह पर तवक्कुल कर लिया है जो मेरा भी मालिक है और तुम्हारा भी मालिक है. जितने चलने वाले हैं सब कीचोटी इसने पकड़ रखी है. यकीनन मेरा रब सिरात-ए-मुस्तकीम है.''
सूरह हूद -११, १२-वाँ परा आयत (५५-५६)
ये बे वज़न बातें, ये पागल पन की दलीलें, ये बकवास, ये खुराफ़ाती झक क्या किसी अल्लाह का कलाम हो सकता है?

''और जब हमारा हुक्म पहुँचा (अज़ाब के लिए)तो हमने हूद को और जो इनके हमराह अहले ईमान थे उनको अपनी इनायत से बचा लिया और उनको एक सख्त अज़ाब से बचा लिया.''
सूरह हूद -११, १२-वाँ परा आयत (५८)
अहले इल्म कुरआन में जाहिल मुहम्मद के इन तमाम जुमलों पर गौर करें, बजाए इसके कि ब्रेकेट लगा लगा कर इसमें बेशर्मी के साथ मानी-ओ-मतलब पैदा करने के..
''खूब सुन लो आद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया, खूब सुन लो, रहमत से दूरी हुई, आद को जो कि हूद की कौम थी.''
सूरह हूद -११, १२-वाँ परा आयत (६०)
मुहम्मद ने पच्चीस साल की उम्र तक मक्का वालों की बकरियाँ चराई है, हलीमा दाई के सुपुर्द होने के बाद उनके तमाम क़िस्से मामूली हैं हक़ीक़त यही है। इस दौरान इनसे इतना न हुआ कि पढना लिखना ही सीख लेते . बन गए अल्लाह के रसूल और गढ़ने लगे अल्लाह का कलाम. पूरा कुरान ऐसे ही कूड़े का अम्बार है. मैं तो आपको झलक भर दिखला रहा हूँ. एक एक नामों से क़िस्से कहानियाँ बार बार दोहराई गई हैं।

''और हमने समूद को पास उनके भाई सालेह को भेजा, उन्हों ने फ़रमाया, ए मेरी कौम तुम अल्लाह की इबादत करो। इसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं. इसने तुमको ज़मीन से पैदा किया और इसने तुम को इस में आबाद किया तो तुम अपने गुनाह इस से मुआफ़ कराओ, फिर इसकी तरफ़ मुतवज्जह रहो. बेशक मेरा रब क़रीब है क़ुबूल करने वाला.''
सूरह हूद -११, १२-वाँ परा आयत (६१)
गोया अल्लाह के इर्तेकाब जुर्म का हवाला है, ''ज़मीन से पैदा किया और इसने तुम को इस में आबाद किया तो तुम अपने गुनाह इस से मुआफ़ कराओ'' और इसके लिए उसी से मुआफी भी. कभी अल्लाह उछलते हुए पानी से इन्सान को पैदा करता है, कभी खून के लोथड़े से और अब ज़मीन से.
मुहम्मद ४०साल तक मिटटी पत्थर और मुख्तलिफ धात के बने बुतों के पुजारी रहने के बाद अचानक एक वाहिद माबूद, हवा के बुत की पूजा करने लगे और उसका प्रचार भी करने लगे, लोग कहने लगे अच्छे खासे हमीं जैसे थे, यह तुमको हो क्या गया है? इन्हीं सवालों और बहसों को सैकड़ों बार जिन जिन नाबियों का नाम सुन रखा था उनके साथ गढ़ गढ़ कर कुरआन तैयार किया - - - ''लोग कहने लगे कि ऐ सालेह तुम तो इस से क़ब्ल हम में होनहार थे, क्या तुम हम को इन चीज़ों से मना करते हो जिसकी इबादत तुम्हारे बुज़ुर्ग किया करते थे? और तुम जिस तरफ हमको बुला रहे हो हम वाक़ई बड़े शुब्हे में हैं. आपने फ़रमाया ऐ मेरी कौम! यह तो बताओ कि अगर मैं अपने रब की जानिब से दलील पर हूँ , उसने अपनी तरफ मुझ पर रहमत अता फरमाई है तो अगर मैं अल्लाह का कहना न मानूँ तो मुझे कौन बचाएगा. तुम तो सरासर मेरा नुकसान ही कर रहे हो.''
सूरह हूद -११, १२-वाँ परा आयत (६३)
ये है पुर दलील और हिकमत का कुरान

आवारा ऊटनी की गाथा फिर मुहम्मद दोहराते हैं और पल झपकते ही समूद आकर ग़ायब हो जाते हैं
एक बार इब्राहीम अलैहिस्सलाम मय अपनी बीवी सारा के फिर पकडे जाते हैं- - -
''और हमारे भेजे हुए इब्राहीम के पास बशारत लेकर आए, उन्हों ने सलाम किया, उन्हों ने भी सलाम किया, फिर देर न लगाई कि एक तला हुवा बछड़ा लाए. सो उन्हों ने देखा कि उनके हाथ इस तक नहीं बढ्हते तो उन से मुत्वहहिश हुए और उनसे दिल में खौफ ज़दा हुए. वह कहने लगे डरो मत हम कौम लूत की तरफ भेजे गए हैं और इनकी बीवी खड़ी थीं, पस हसीं, सो हमने बशारत देदी इनको इस्हाक़ की और इस्हाक़ से पीछे याकूब की. कहने लगीं कि हाय खाक पड़े अब मैं बच्चा जनूं बुढ़िया होकर और यह मेरे मियाँ हैं बिलकुल बूढ़े. वाकई अजीब बात है. कहा क्या तुम अल्लाह के कामों में तअज्जुब करती हो. इस खानदान के लोगो! तुम पर तो अल्लाह की रहमत और इसकी बरकतें हैं.बेशक वह तारीफ़ के लायक बड़ी शान वाला है.
सूरह हूद -११, १२-वाँ परा आयत (६८-७३)
मुसलामानों देखो कि यह एक चरवाहे का कलाम है जिसको बात करने की भी तमीज़ नहीं, कम अज़ कम आम आदमी की तरह क़िस्सा गोई ही कर पाता, बात को वाज़ेह कर पाता। मुतरज्जिम को इस उम्मी की काफी मदद करनी पड़ी फिर भी कहानी के बुनियाद को वह क्या करता. मुहम्मद के रक्खे गए बेसिर पैर की बुन्याद को कैसे खिस्काता? क्या अल्लाह के नाम पर ऐसी जग हँसाई करवाना इस सदी में आप को ज़ेबा देता है? क्या मुहम्मद उमर कैरान्वी की तरह बे गैरती के घूँट आपने भी पी रखी हैं? उसकी तो रोटी रोज़ी का मसअला है मगर आप ज़मीर फरोश तो नहीं हैं.


निसार '' निसार-उल-ईमान''
अगली किस्त में देखिए मुआबियों और ओमान्यों के मूरिसे आला (मूल पुरुष) लूत का दिल चस्प किस्सा.

7 comments:

  1. मामा का अनुवाद लेके चाचा अल्‍बेदार आया है, वह भी काट छाँट के लाता है चिंता में बिन्‍दी काट दें तो कहते हैं कुछ का कुछ हो जाता है हूद का किस्‍सा पढ लो, लूत पर फिर मिलेंगे

    quran:
    ये परोक्ष की ख़बरें हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे है। इससे पहले तो न तुम्हें इनकी ख़बर थी और न तुम्हारी क़ौम को। अतः धैर्य से काम लो। निस्संदेह अन्तिम परिणाम डर रखनेवालो के पक्ष में है॥11:49॥
    और 'आद' की ओर उनके भाई 'हूद' को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य प्रभु नहीं। तुमने तो बस झूठ घड़ रखा हैं॥11:50॥
    ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता। मेरा पारिश्रमिक तो बस उसके ज़िम्मे है जिसने मुझे पैदा किया। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?॥11:51॥
    ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अपने रब से क्षमा याचना करो, फिर उसकी ओर पलट आओ। वह तुमपर आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ेगा और तुममें शक्ति पर शक्ति की अभिवृद्धि करेगा। तुम अपराधी बनकर मुँह न फेरो।"॥11:52॥
    उन्होंने कहा, "ऐ हूद! तू हमारे पास कोई स्पष्‍ट प्रमाण लेकर नहीं आया है। तेरे कहने से हम अपने इष्‍ट-पूज्यों को नहीं छोड़ सकते और न हम तुझपर ईमान लानेवाले है॥11:53॥
    हम तो केवल यही कहते है कि हमारे इष्‍ट-पूज्यों में से किसी की तुझपर मार पड़ गई है।" उसने कहा, "मैं तो अल्लाह को गवाह बनाता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं, जिनको तुम साझी ठहराकर उसके सिवा पुज्य मानते हो। अतः तुम सब मिलकर मेरे साथ दाँव-घात लगाकर देखो और मुझे मुहलत न दो॥11:54-11:55॥
    मेरा भरोसा तो अल्लाह, अपने रब और तुम्हारे रब, पर है। चलने-फिरनेवाला जो प्राणी भी है, उसकी चोटी तो उसी के हाथ में है। निस्संदेह मेरा रब सीधे मार्ग पर है॥11:56॥
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    signature:
    विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
    (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
    antimawtar.blogspot.com (Rank-2 Blog) डायरेक्‍ट लिंक

    अल्‍लाह का चैलेंज पूरी मानव-जाति को

    अल्‍लाह का चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता

    अल्‍लाह का चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं

    अल्‍लाह का चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार

    अल्‍लाह का चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में

    अल्‍लाह का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी

    छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
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  2. यक़ीनन मोमिन का ईमान मर्द मोमिन का ईमान धर्म कांटे के तुले हुए कुदरती सच 2+2=4 की तरह है...

    काफ़ी अरसे से आपका ब्लॉग देख रहे हैं... यह काम किसी ग़ैर मुस्लिम का तो क़तई नहीं हो सकता...
    इतनी मेहनत... कमाल है और क़ाबिले-तारीफ़ भी...

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  3. अगर आप Word verification हटा लेंगे तो कमेन्ट करने वाले को आसानी रहेगी...

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  4. फिरदौस जी के दोनों कमेण्ट्स दोहरा रहा हूं..

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  5. कैरानवी जी तो ऐसे ही रहेंगे. उनका दायरा सीमित है. उससे बाहर देखना ही नहीं चाहते.. यदि इसमें लिखी बातें गलत हैं तो तथ्य और प्रमाणों के साथ सामने रखें...

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  6. @ अभी समय है आओ विचार करें

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    विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
    (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
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    अल्‍लाह का चैलेंज पूरी मानव-जाति को

    अल्‍लाह का चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता

    अल्‍लाह का चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं

    अल्‍लाह का चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार

    अल्‍लाह का चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में

    अल्‍लाह का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी

    छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
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  7. भारत के विनाश और पतन का कारण केवल ब्राह्मण हैं। मेरे लेखों से यह सच्चाई उजागर होते देखकर जनाब बी. एन. शर्मा परेशान हो गये और किसी मत में विश्वास न रखने के बावजूद वे ब्राह्मणी मायाजाल की रक्षा में कमर कसकर मैदान में कूद गये। उन्होंने इस्लाम के बारे में जो कुछ भी कहा वह केवल इसलिये ताकि लोग इस्लाम के नियमों को मानकर ब्राह्मणी मायाजाल से मुक्त न हो जाएं।
    इस्लाम के युद्धों में कमियां निकालने वालों को डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ का यह लेख देखना चाहिये।
    क्या वेद अहिंसावादी हैं ? - डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ The True Hindu
    नीचे इंद्र और उसके युद्धों का वर्णन करने वाले कुछ मंत्र प्रस्तुत हैं :

    त्वमेतात्र् जनराज्ञो द्विदशाबंधुना सुश्रवसोपजग्मुषः ,
    षष्टिं सहसा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्
    ( ऋग्वेद , 1-53-9 )
    अर्थात हे इंद्र , सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए आए 20 राजाओं और उनके 60,099 अनुचरों को तुमने पराजित कर दिया था ।

    इंद्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः जघान नवतीर्नव ।
    ( ऋग्वेद , 1-84-13 )
    अर्थात अ-प्रतिद्वंदी इंद्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वृत्र आदि असुरों को 8-10 बार नष्ट किया ।

    अहन् इंद्रो अदहद् अग्निः इंद्रो पुरा दस्यून मध्यन्दिनादभीके ।
    दुर्गे दुरोणे क्रत्वा न यातां पुरू सहस्रा शर्वा नि बर्हीत्
    ( ऋग्वेद , 4-28-3 )
    अर्थात हे सोम , तुझे पी कर बलवान हुए इंद्र ने दोपहर में ही शत्रुओं को मार डाला था और अग्नि ने भी कितने ही शत्रुओं को जला दिया था । जैसे किसी असुरक्षित स्थान में जाने वाले व्यक्ति को चोर मार डालता है , उसी प्रकार इंद्र ने हज़ारों सेनाओं का वध किया है ।

    अस्वापयद् दभीयते सहस्रा त्रिंशतं हथैः, दासानिमिंद्रो मायया ।
    ( ऋग्वेद , 4-30-21 )
    अर्थात इंद्र ने अपने कृपा पात्र दभीति के लिए अपनी शक्ति से 30 हज़ार राक्षसों को अपने घातक आयुधों से मार डाला ।

    नव यदस्य नवतिं च भोगान् साकं वज्रेण मधवा विवृश्चत्,
    अर्चंतींद्र मरूतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम ।
    ( ऋग्वेद , 5-29-6 )
    अर्थात इंद्र ने वज्र से शंबर के 99 नगरों को एक साथ नष्ट कर दिया । तब संग्राम भूमि में ही मरूतों ने त्रिष्टुप छंद में इंद्र की स्तुति की । तब जोश में आकर इंद्र ने वज्र से शंबर को पीड़ित किया था ।

    नि गव्यवो दुह्यवश्च पष्टिः शता सुषुपुः षट् सहसा
    षष्टिर्वीरासो अधि षट् दुवोयु विश्वेदिंद्रस्य वीर्या कृतानि
    ( ऋग्वेद , 7-18-14 )
    अर्थात अनु और दुहयु की गौओं को चाहने वाले 66,066 संबंधियों को सेवाभिलाषी सुदास के लिए मारा गया था । ये सब कार्य इंद्र की शूरता के सूचक हैं ।
    वेदों में युद्ध के लिए युद्ध करना बड़े बड़े यज्ञ करने से भी ज़्यादा पुण्यकारी माना गया है । आज तक जहां कहीं यज्ञ होता है , उस के अंत में निम्नलिखित शलोक पढ़ा जाता है ।
    अर्थात अनेक यज्ञ , कठिन तप कर के और अनेक सुपात्रों को दान दे कर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं , अपने जातिधर्म का पालन करते हुए युद्धक्षेत्र में प्राण त्यागने वाले शूरवीर क्षत्रिय उस से भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं ।
    http://vedquran.blogspot.com/2010/04/true-hindu.html

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