Tuesday, 26 January 2010

क़ुरआन -सूरह एराफ -७


सूरह अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा
The Elevated Places
7-B

मैं एक नास्तिक हूँ . दर असल नास्तिकता संसार का सब से बड़ा धर्म होता है और धर्म की बात ये है कि यह बहुत ही कठोर होता है, क्यूंकि यह उरियाँ सदाक़त अर्थात नग्न सत्य होता है. आम तौर पर नग्नता सब को बुरी लगती है मगर परिधान बहर हाल दिखावा है, असत्य है. अगरपरिधान सर्दी गर्मी से बचने के लिए हो तो ठीक है अन्यथा झूट को छुपाने के सिवा कुछ भी नहीं.. श्रृंगार कुछ भी हो बहर हाल वास्तविकता की पर्दा पोशी मात्र है. शरीर की हद तक - - इसके विरोध में आपत्तियाँ गवारा हैं मगर विचारों का श्रृगार बहार सूरत अधर्म है। यह तथा कथित धर्म एवं मज़हब विचारों की सच्ची उड़ान में टोटका के रूप में बाधा बन जाते हैं और मानव को मानवीय मंजिल तक पहुँचने ही नहीं देते, कुरआन इस वैचारिक परवाज़ को शैतानी वुस्वुसा कहता है। अगर मुहम्मद के गढे अल्लाह पर विचार उसकी कारगुजारी के बाबत की जाए तो उस वक़्त यह बात पाप हो जाती है , इस स्टेज तक विचार के परवाज़ को शैतान का अमल गुमराह करना और गुमराह होना बतलाया जाता है और इस के बाद पराश्चित करनी पड़ती है. इसके लिए किसी मोलवी, मुल्ला के पास जाना पड़ता है जिनके हाथों में मुसलामानों की लगाम है. जहाँ विचार की सीमा को लांघने पर ही पाबंदी हो वहां किसी विषय में शिखर छूना संभव ही नहीं. परिणाम स्वरूप कोई मुसलमान आज तक डेढ़ हज़ार साल होने को है किसी नए ईजाद का आविष्कारक नहीं किया. ईमान दार बुद्धि जीवी तक नहीं हो पाते। जब आप अपने लिए या अपने परिवार, अपने वर्ग, अपने कौम या यहाँ तक कि अपने देश के लिए ही क्यों न हो असत्य को श्रृंगारित करते हैं, तो ये पाप जैसा है..
मैं इस्लाम की ज़्यादः हिस्सा बातों का विरोध करता हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि बाक़ी धर्मों में बुराइयाँ नहीं. एक हिदू मित्र की बात मुझे साल गई कि '' आप मुसलामानों के लिए जो कर रहे हैं, सराहनीय है परन्तु अपने सीमा में ही रहें , हमारे यहाँ समाज सुधारक बहुतेरे हो चुके है.'' ठीक ही कहा उन्हों ने. वह हिन्दू है, अगर जबरन मुझे भी मुसलमान समझें तो आश्चर्य की बात नहीं क्यूंकि वह हिन्दू हैं. मैं सीमित हो गया क्यूंकि मुसलमानों में पैदा होना मेरी बे बसी थी ,एक तरह से अच्छा ही हुआ कि मुसलामानों की अनचाही सेवा कर रहा हूँ। वह कुछ फ़ायदा उठा सके तो हमारे दुसरे मानव भाई भी लाभान्वितहोंगे .
आइए चलें कुरआनी आयतों में जो मानव जाति के लिए अभिशोप बनी हुई हैं - - -

अल्लाह बार बार आदम की औलादों को तालीम देता है कि हमने तुम्हारे लिए ज़मीन पर तन ढकने के लिए लिबास पैदा किया, शैतान के बहकाने में कभी मत आना जिसने तुम्हारे दादी दादा को बहका कर उरियाँ कर दिया था। उस वक़्त के आदम के नाती पोतों को मुहम्मद अपनी रिसालत पर ईमान लाने का प्रचार करते हैं जब न करघा न रूई सिवाए जन्नत के पत्तों के। कहते हैं कि
''ऐ आदम की औलादों! तुम मस्जिद की हर हाज़री के वक़्त अपना लिबास पहेन कर जाया करो'' गोया ज़मीन पर आते ही आदम की औलादों ने कपडा बुनना, सीना पिरोना शुरू कर दिया था.

फरमाते हैं - - - '' ऐ औलादे आदम ! अगर तुम्हारे पास पैगम्बर आवें जो तुम में से ही होंगे, जो मेरे ही एह्काम तुम से बयान करेंगे, सो जो शख्स परहेज़ और दोस्ती करे सो इन लोगों पर कुछ अंदेशा नहीं. हम इसी तरह तमाम आयात को समझदारों के लिए साफ़ साफ़ बयान करते हैं.''
सो मुहम्मद आदम के औलादों के अव्वलीन मोलवी बन्ने में कोई शरम महसूस नहीं करते न ही मुसलामानों को घास चराने में. वह आदम की औलाद हबील काबील को समझाते हैं कि हमारी इन मकर आलूद आयातों को झुटलाओगे तो जहन्नम रसीदा हो जाओगे. बच्चों का अंध विशवास जवान होते होते टूट जाता है मगर जवान जब आस्था का घुट पी लेता है तो उसका अंध विशवास तभी टूटता है जब सदाक़त मौत बन कर सामने कड़ी होती है.
अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (२५-३९)
''अल्लाह की आयातों को झुटलाने वाले लोग कभी भी जन्नत में न जावेंगे जब तक कि ऊँट सूई के नाके से न निकल जाए.''
अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (४०)
''ऊँट सूई के नाके से निकल सकता है मगर दौलत मंद जन्नत में कभी दाखिल नहीं हो सकता'' ईसा की नकल में मुहम्मद की कितनी फूहड़ मिसाल है जहाँ अक्ल का कोई नामो निशान नहीं है.शर्म तुम को मगर नहीं आती. मुसलमानों तुम ही अपने अन्दर थोड़ी गैरत लाओ.
ईसा कहता है - - - ''ऐ अंधे दीनी रहनुमाओं! तुम ढोंगी हो, मच्छर को तो छान कर पीते हो और ऊँट को निगल जाते हो.'' मुवाज़ना करें मुस्लिम अपने कठमुल्ल्ले सललललाहो अलैहे वसल्लम को शराब में तुन रहने वाले ईसा से.
तौरेत की भोंडी पैरवी करते हुए मुहम्मदी अल्लाह बतलाता है कि उसने दुन्या छ दिन में बनाई और सातवें रोज़ आसमान पर जा बैठा. दूसरी तरफ वह कहता है कि वह बड़े से बड़े काम के लिए 'कुन' भर कहता है और काम हो जाता है, छ दिन दुन्या में झक मरने की क्या ज़रुरत थी या तो यह 'कुन फयकून' मुहम्मद की गढ़ंत. है ये अकली तज़ाद है
''और इन के लिए दोज़ख का बिछौना होगा और उसके ऊपर ओढना होगा और हम ऐसे जालिमों को ऐसी सज़ा देते हैं.''
सूरह अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (४१)
वाह अल्लाह मियाँ ! ज़ुल्म खुद करते हो और मजलूम को ज़ालिम कहते हो?
''सब दीनी कामों में मसरूफ है, अल्लाह भारी भारी बादलों को हवाओं के हवाले करता है जो इन्हीं लुड्कती हुई खुश्क बस्तियों तक ले जाती हैं''
अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (४२)
हवाओं और बादलों का दीनी काम मुलाहिजा हो. जब यही हवाएं और बादल तूफ़ान और तबाही की शक्ल अख्तियार कर लेते है तो इन को कैसा काम कहा जाए? मुहम्मद फितरत के राज़ से गाफ़िल और हवा में तीर चलाने में माहिर, मोलवियों को निशाना दिया है कि नादान मुसलामानों का शिकार करो.
* मुहम्मदी अल्लाह अपने लाल बुझक्कड़ी दिमाग की परवाज़ भरते हुए औलादे नूह, आद, हूद, सालेह वागैरा की इबरत नाक कहानी छेड़ देता हैजो कि पैगम्बर के हक में हो और साथ साथ इस किस्म की बातें - - -
''गरज कि उन्हों ने उस ऊट्नी को मार डाला और अपने परवर दिगार के हुक्म से सरकशी कीऔर कहने लगे की ऐ सालेह ! जैसा कि आप हम को धमकी देते थे इसको मंगवाएं अगर पैगम्बर हों. पस आ पकड़ा इनको ज़लज़ले ने, सो अपने घरों में औंधे के औंधे पड़े रह गए. उस वक़्त वह उन से मुंह मोड़ कर चले कि ऐ मेरी कौम ! मैं ने तो तुम को अपने परवर दिगार का हुक्मपहुँचा दिया था.''
अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (८८-८९)
गौर तलब है कि कैसा चरवाहा नुमा अल्लाह रहा होगा जिसने किसी ऊंटनी को आवारह बना कर छोड़ दिया होगा और इंसानों को इसे पकड़ने से मना कर दिया होगा. मगर उस ज़माने के गिद्ध नुमा इंसानों ने उसे दबोच कर खा लिया होगा. इस किस्से के पसे मंज़र में कोई पौराणिक कथा या वाकआ होग़ जो मुहम्मद के कानों में पड़ा होगा और वह कुरआनी आयत बन गया . qur आन ऐ हकीम यानी हिकमत वाला कुरआन . मुसलमान आँख खोल कर अल्लाह की हिकमत को देखें.
अल्लाह की छोड़ी हुई ऊंटनी को कौम के सरकश लोग मार डालते हैं और मुन्ताकिम मुहम्मदी अल्लाह खित्ते में ज़लज़ला बरपा कर देता है जिसके अज़ाब से सारी कौम तबाह हो जाती है जिसमें साहिबे ईमान भी होते है और बे इमान भी.. मुहम्मद की कुरआनी चूल कहीं से भी तो फिट बैठे.
''और हम ने लूत को भेजा जब उन्हों ने अपने कौम से फरमाया क्या तुम ऐसा फहश काम करते हो कि जिसको तुम से पहले किसी ने दुन्या जहान वालों ने न किया हो? तुम मर्दों के साथ शहवत रानी करते हो, औरतों को छोड़ कर, बल्कि तुम हद से ही गुज़र गए हो.''
अलएराफ़ ७ -आठवाँ पारा आयत (८१)
बाबा इब्राहिम के भतीजे लूत (लोट) के इतिहास में मुहम्मद को सिर्फ यही गलत वाकेआ मालूम है जब कि इंजील कहती है कि लूत एक ऐसी बस्ती में रात भर के लिए मेहमान हुए थे जहां लोग समलैंगिक थे और लूत को भी शिकार बनाने के लिए बज़िद थे. मुहम्मद ने चरवाहे लूतकी उम्मत भी गढ़ दी और उम्मत को समलैंगिक करार दे दिया.
मुसलामानों! इस तरह से तारीखी वाकेआत को एक अनपढ़ ने तोड़ मरोड़ कर अपनी पैगम्बरी के लिए कुरआन को गढ़ा है।

निसार ''निसार-उल-ईमान''
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ऐतिहासिक सत्य में क़ुरआन की हक़ीक़त

Allah continued: "'On earth will be your dwelling place and your means of livelihood for a time.' He [third person, singular] said: "Therein shall you live, and therein shall you die, and from it shall you be raised. O children of Adam. [How did they get kids so fast?] We [first person plural] have sent clothing down to you to cover your shame, and for beauty and clothing that guards against evil. This is of the communications of Allah [now third person singular].'" Why did they need clothes to guard against evil? If their lusts carried them away - with whom were they going to be adulterous?
An interesting sidebar on the first kids comes to us in this Tradition: Tabari I:321 "When Eve became heavy with her first pregnancy, Satan came to her before she gave birth and said, 'Eve, what is that in your womb.' She said, 'I do not know.' He asked, 'Where will it come out from - your nose, your eye, or your ear.' She replied, 'I do not know.' He said, 'Don't you think, if it comes out healthy, you should obey me in whatever I command you?' When she said, 'Yes.' he said: 'Name him Abd al-Harith Iblis - Slave to the cursed.' She agreed." Believable dialog, don't you think? Just the kind of foundation you'd expect to underpin a great religion. "Adam said to him [Iblis/Lucifer], 'I obeyed you once before and you caused me to be driven out of Paradise.' So he refused to obey him and called the child Abd Ar-Rahman."
Ar-Rahman was the name of Muhammad's first "god." The 55th surah, named in Ar-Rahman's honor, begins: "Ar-Rahman bestowed the Qur'an, created man, and taught him to express clearly. The sun and moon revolve to his computation and the grasses and the trees bow to Him in adoration.... He created man." With multiple gods, Islam became pagan monotheism.
And with multiple truths, Islam is flawed revelation: Tabari I:275 "They ate from it and as a result their secret part that had been concealed became apparent." It hadn't been much of a marriage up to that point. But if that's true, how did they get kids? And why does the Islamic Tradition say: Tabari I:299 "It was the cover of fingernails that had kept their secret parts concealed."
Qur'an 7:27 "O you Children of Adam, let not Satan seduce you, in the same manner as he got your parents out of the Garden, making them disrobe, stripping them of their clothing, to expose their shame." Just six verses earlier, Adam was nude, sinned, and thus felt the need for clothing. He made his own, sewing together leaves. Then Allah sent down supernatural clothes from AlMart. Now we're told that Satan stripped them? "For he [Satan/Lucifer] and his tribe [of demons/jinn] watch you from a position where you cannot see them. We made the jinn friends of the unbelievers." So there you have it. Satan, Iblis, and jinn are all cut from the same cloth - all made of fire, all from the same tribe. These invisible evil spirits, or demons, lurk in the shadows ready to ambush men, deceiving them. Yet, as you shall discover in one of the most bizarre Qur'anic passages, these pesky demons think Muhammad and Allah are swell, calling them "Prophet" and "Lord." They are employed to authenticate the Qur'an.
Qur'an 7:30 "Some He has guided: as for others, error is their due. They deserve loss in that they took the devils instead of Allah for their friends and think that they are rightly guided." Qur'an 7:35 "Children of Adam, whenever messengers come from amongst you, rehearsing My [singular] signs and revelations to you, act rightly so that you have no fear, nor reason to grieve. But those who reject Our [plural] signs and scorn them with arrogance, they are inmates of the Fire forever." What messengers, what revelations? Allah is allegedly talking to Adam's kids. The first prophet and scripture wouldn't arrive for over two thousand years. The Islamic god had no concept of time. Worse, he couldn't even keep himself together, talking in first person singular and plural in the same verse. Somebody was very confused.
The second part of this passage is revealing. As we dig deeper into the Qur'an you'll find that the most repeated theme is: "reject Muhammad and you're toast." Although he tries a number of variants, his favorites twist Bible stories, as he has done here. Muhammad was referring to himself when he warned Adam's kids not to reject the "messenger among them."
Qur'an 7:37 "Who is more unjust: one who invents a lie against Allah or one who rejects His Signs? For such, their appointed destiny must reach them from when Our messengers of death arrive and take their souls. [These guys sound a little like Hitler's S.S.] They say: 'Now where is that to which you cried to beside Allah.' They will reply, 'They have left us in the lurch.'" There were no signs, no miracles, no proofs of any kind to confirm Muhammad's claim to being a prophet or the Qur'an's claim to being divinely inspired. The repetition of lies like this was just part of Muhammad's warped game. It's standard megalomaniac behavior. Tell a big enough lie, say it often enough, and enough will believe it for you to prevail.
Qur'an 7:38 "Allah's messengers of death will say: 'Enter the fire, join the company of men and jinn who passed away before you.' Every time a fresh group of people or nation enters, they curse those that went into the Fire before them. The most recent entrants into Hell ask: 'Lord, they led us astray, so give them a double torment in the Fire.' He will say: 'For each there is already a double dose of torment.... So taste the punishment.'"
Prophet of Doom

2 comments:

  1. अपने मामा के किये अनुवाद से दे रहे हो, अब भी समय है आओ
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    विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
    (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
    antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog)
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    अल्‍लाह का
    चैलेंज पूरी मानव-जाति को

    अल्‍लाह का
    चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता

    अल्‍लाह का
    चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं

    अल्‍लाह का
    चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार

    अल्‍लाह का
    चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में

    अल्‍लाह
    का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी


    छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
    islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)
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  2. भारत के विनाश और पतन का कारण केवल ब्राह्मण हैं। मेरे लेखों से यह सच्चाई उजागर होते देखकर जनाब बी. एन. शर्मा परेशान हो गये और किसी मत में विश्वास न रखने के बावजूद वे ब्राह्मणी मायाजाल की रक्षा में कमर कसकर मैदान में कूद गये। उन्होंने इस्लाम के बारे में जो कुछ भी कहा वह केवल इसलिये ताकि लोग इस्लाम के नियमों को मानकर ब्राह्मणी मायाजाल से मुक्त न हो जाएं।
    इस्लाम के युद्धों में कमियां निकालने वालों को डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ का यह लेख देखना चाहिये।
    क्या वेद अहिंसावादी हैं ? - डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ The True Hindu
    नीचे इंद्र और उसके युद्धों का वर्णन करने वाले कुछ मंत्र प्रस्तुत हैं :

    त्वमेतात्र् जनराज्ञो द्विदशाबंधुना सुश्रवसोपजग्मुषः ,
    षष्टिं सहसा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्
    ( ऋग्वेद , 1-53-9 )
    अर्थात हे इंद्र , सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए आए 20 राजाओं और उनके 60,099 अनुचरों को तुमने पराजित कर दिया था ।

    इंद्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः जघान नवतीर्नव ।
    ( ऋग्वेद , 1-84-13 )
    अर्थात अ-प्रतिद्वंदी इंद्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वृत्र आदि असुरों को 8-10 बार नष्ट किया ।

    अहन् इंद्रो अदहद् अग्निः इंद्रो पुरा दस्यून मध्यन्दिनादभीके ।
    दुर्गे दुरोणे क्रत्वा न यातां पुरू सहस्रा शर्वा नि बर्हीत्
    ( ऋग्वेद , 4-28-3 )
    अर्थात हे सोम , तुझे पी कर बलवान हुए इंद्र ने दोपहर में ही शत्रुओं को मार डाला था और अग्नि ने भी कितने ही शत्रुओं को जला दिया था । जैसे किसी असुरक्षित स्थान में जाने वाले व्यक्ति को चोर मार डालता है , उसी प्रकार इंद्र ने हज़ारों सेनाओं का वध किया है ।

    अस्वापयद् दभीयते सहस्रा त्रिंशतं हथैः, दासानिमिंद्रो मायया ।
    ( ऋग्वेद , 4-30-21 )
    अर्थात इंद्र ने अपने कृपा पात्र दभीति के लिए अपनी शक्ति से 30 हज़ार राक्षसों को अपने घातक आयुधों से मार डाला ।

    नव यदस्य नवतिं च भोगान् साकं वज्रेण मधवा विवृश्चत्,
    अर्चंतींद्र मरूतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम ।
    ( ऋग्वेद , 5-29-6 )
    अर्थात इंद्र ने वज्र से शंबर के 99 नगरों को एक साथ नष्ट कर दिया । तब संग्राम भूमि में ही मरूतों ने त्रिष्टुप छंद में इंद्र की स्तुति की । तब जोश में आकर इंद्र ने वज्र से शंबर को पीड़ित किया था ।

    नि गव्यवो दुह्यवश्च पष्टिः शता सुषुपुः षट् सहसा
    षष्टिर्वीरासो अधि षट् दुवोयु विश्वेदिंद्रस्य वीर्या कृतानि
    ( ऋग्वेद , 7-18-14 )
    अर्थात अनु और दुहयु की गौओं को चाहने वाले 66,066 संबंधियों को सेवाभिलाषी सुदास के लिए मारा गया था । ये सब कार्य इंद्र की शूरता के सूचक हैं ।
    वेदों में युद्ध के लिए युद्ध करना बड़े बड़े यज्ञ करने से भी ज़्यादा पुण्यकारी माना गया है । आज तक जहां कहीं यज्ञ होता है , उस के अंत में निम्नलिखित शलोक पढ़ा जाता है ।
    अर्थात अनेक यज्ञ , कठिन तप कर के और अनेक सुपात्रों को दान दे कर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं , अपने जातिधर्म का पालन करते हुए युद्धक्षेत्र में प्राण त्यागने वाले शूरवीर क्षत्रिय उस से भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं ।
    http://vedquran.blogspot.com/2010/04/true-hindu.html

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