Wednesday, 10 February 2010

क़ुरआन - सूरह - इंफाल ८


सूरह इंफाल - ८
The Spoils of War-8
B

गवाही
राम चन्द्र परम हँस ने अदालत में हलफ़ उठा कर गवाही दी थी कि '' मैं ने अपनी आँखों से देखा कि गर्भ गृह से राम लला प्रगत हुए, वहाँ जहाँ बाबरी ढाँचा खड़ा था. अदालत ने उनकी गवाही झूटी मानी, राम चन्द्र परम हँस की जग हँसाई हुई, मुस्लमान खुल कर हँसे तो हिदू भी मुस्कुराए बिना रह न सके. अब ऐसे हिदुओं की बात अलग है जो 'क़सम गीता की खाते फिरते हैं हाथों को तोड़ने के लिए' जो नादन ही नहीं बे वकूफ भी होते हैं. राम चन्द्र परम हँस को शर्म नहीं आई, हो सकता है उनकी गवाही सही रही हो गवाही की हद तक. उन्हों ने अपने चेलों से कह दिया हो कि राम लला की मूर्ती चने भरी हांड़ी के ऊपर रख उसमे पानी भर देना और मूर्ती हांड़ी समेत मिटटी में गाड़ देना, चना अंकुरित होकर राम लाला को प्रगट कर देगा. इस परिक्रिया भर की मैं शपत लेलूँगा जो बहर हल झूट तो न होगा.
मुसलमान बाबरी मस्जिद में साढ़े तीन सौ साल से मुश्तकिल तौर पर अलल एलान झूटी गवाही दिन में पांच बार देता चला आया है तो उस पर कोई इलज़ाम, कोई मुक़दमा नहीं? वह गवाही है इस्लामी अज़ान. अज़ान का एक जुमला मुलाहिजा हो - - -
''अशहदो अन्ना मुहम्मदुर रसूलिल्लाह''
अर्थात '' मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के दूत हैं''
अल्लाह को किसने देखा है कि वह मुहम्मद को अपना रसूल बना रहा है और किसने सुना है? कौन है और कितने हैं चौदह सौ सालों के उम्र वाले आज जो ज़िन्दा हैं इस वाकेए के गवाह जो चिल्ला चिल्ला कर गवाही दे रहे हैं ''अशहदो अन्ना मुहम्मदुर रसूलिल्लाह''
दुन्या की हज़ारों मस्जिदों में लाखों मुहम्मद के झूठे गवाह, झूठे राम चन्द्र परम हँस से भी गए गुज़रे हैं.
मुसलामानों गौर करो क्या तुम को इस से बढ़ कर तुम्हारी नादानी का सुबूत चाहिए? तुम तो इन गलीज़ ओलिमा के जारीए ठगे जा रहे हो. अपनी आँखें खोलो .

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देखिए मुहम्मदी अल्लाह इंसानी खून का कितना प्यासा दिखाई देता है, मुसलामानों को प्रशिक्षित कर रह है क़त्ल और गारत गरी के लिए - - -
'' ऐ ईमान वालो! जब तुम काफिरों के मुकाबिले में रू बरू हो जाओ तो इन को पीठ मत दिखलाना और जो शख्स इस वक़्त पीठ दिखलाएगा, अल्लाह के गज़ब में आ जाएगा और इसका ठिकाना दोज़ख होगा और वह बुरी जगह है. सो तुम ने इन को क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ने इनको क़त्ल किया और आप ने नहीं फेंकी (?) , जिस वक़्त आप ने फेंकी थी, मगर अल्लाह ने फेंकी और ताकि मुसलामानों को अपनी तरफ से उनकी मेहनत का खूब एवज़ दे. अल्लाह तअला खूब सुनने वाले हैं.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (१५-१६-१७)
मज़ाहिब ज्यादह तर इंसानी खून के प्यासे नज़र आते हैं ख़ास कर इस्लाम और यहूदी मज़हब. इसी पर उनकी इमारतें खड़ी हुई हैं धर्म ओ मज़हब को भोले भाले लोग इनके दुष प्रचार से इनको पवित्र समझते हैं और इनके जाल में आ जाते हैं. तमाम धार्मिक आस्थाओं का योग मेरी नज़र में एक इंसानी ज़िन्दगी से कमतर होता है. गढ़ा हुवा अल्लाह मुहम्मद की कातिल फितरत का खुलकर मुजाहिरा करता है. आज की जगी हुई दुनिया में अगर मुसलामानों के समझ में यह बात नहीं आती तो वह अपनी कब्र अपने हाथ से तैयार कर रहे हैं. कुरआन में अल्लाह फेंकता है यह कोई अरबी इस्तेलाह रही होगी मगर आप हिदी में इसे बजा तौर पर समझ लें कि अल्लाह जो फेंकता है वह दाना फेंकने की तरह है, बण्डल छोड़ने की तरह है और कहीं कहीं जीट छोड़ने की तरह.
''और तुम उन लोगों की तरह न होना जो दावे करते हैं कि हमने हैं सुन लिया हालाँकि वह सुनते सुनाते कुछ भी नहीं. बेशक बद तरीन खलायक अल्लाह के नज़दीक वह लोग है जो बहरे हैं, गूंगे हैं जोकि ज़रा भी नहीं समझते. ''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (२२)
अल्लाह बने हुए मुहम्मद मस्जिद में तक़रीर कर रहे हैं छल कपट की जिस को लोग खूब समझ रहे हैं और बेज़ार होकर इधर उधर देख रहे हैं गोया उनको एहसास दिला सकें कि वह खूब उनका असली मकसद समझते हैं. मुहम्मद अपने जंबूरे अल्लाह का सहारा बार, बार लेते हैं मगर वह पानी का हुबाब साबित हो रहा है. वह इस्लाम पर ईमान लाए लोगों को बद तरीन मख्लूक़ तक भी कह रहे है, कोई तो मसलेहत होगी कि लोग सर झुका कर महफ़िल में उनकी यह गाली भी बर्दाश्त कर रहे हैं. इन बहरे और गूंगे लोगों पर अल्लाह की कोई हिकमत काम नहीं करती जो दोज़ख में काफिरों की खालें अंगारों से जल जाने के बाद बदलता रहता है.
''अल्लाह तअला इन में कोई खूबी देखे तो इन को सुनने की तौफ़ीक़ दे और अगर इनको सुना दे तो ज़रूर रू गरदनी करेगे बे रुखी करते हुए.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (२३)
दुन्या के मासूम लोग मानते हैं कि कुरआन अल्लाह का कलाम है, ईश वाणी है. क्या ईश्वर भी इंसानों की तरह ही चाल घात और मकर ओ फरेब का दिल ओ दिमाग रखता होगा? जैसा कि कुरआनी आयतें अपने अन्दर छुपाए हुए हैं. इसी लिए मुहम्मद ने इसे रटने और पाठ करने के लिए पुन्य कार्य यानी सवाब करार दे दिया है और कह दिया है कि इसकी गहराई में मत जाओ कि इसको अल्लाह ही बेहतर जानता है. मुहम्मद खूबी वाले लोग उन्हीं को मानते हैं जो डरपोंक हों चापलूस हो और बिला शर्त उनको समर्पित हों. वह ज़हीन लोगों से डरते हैं कि वह ख़तरनाक होते हैं. कुंद ज़हनों पर ही उनका अल्लाह राज़ी है कि मुहम्मद उनका शोषण कर सकते हैं. आज तालिबान जैसे संगठन ठीक मुहम्मद के नक्शे क़दम पर चलते हैं.
'' ऐ ईमान वालो! तुम अल्लाह और रसूल के कहने को बजा लाया करो जब कि रसूल तुम को तुम्हारी ज़िन्दगी बख्श चीजों की तरफ बुलाते हैं और जान रखो अल्लाह आड़ बन जाया करता है आदमी के और उसके क़ल्ब के दरमियान और बिला शुबहा तुम सब को अल्लाह के पास जाना ही है.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत ( २४ )
जादूई खसलत के मालिक मुहम्मद इंसानी ज़ेहन पर इस कद्र क़ाबू पाने में आखिर कार कामयाब हो ही गए जितना की कोई ज़ालिम आमिर किसी कौम पर फ़तह पाकर उसे गुलाम बना कर भी नहीं पा सकती. आज दुन्या की बड़ी आबादी उसकी दरोग की आवाज़ को सर आँख पर ढो रही है और उसके कल्पित अल्लाह को खुद अपने और अपने दिल ओ दिमाग के बीच हायल किए हुए है.
''ऐ ईमान वालो! अगर तुम अल्लाह से डरते रहोगे तो, वह तुम को एक फैसले की चीज़ देगा और तुम से तुम्हारे गुनाह दूर क़र देगा और तुम को बख्श देगा और अल्लाह बड़ा फजल वाला है.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत ( २९ )
अल्लाह के एजेंट बने मुहम्मद उसकी बख्शी हुई रियायतें बतला रहे हैं. पहले उसके बन्दों को समझा दिया कि उनका जीना ही गुनाह है, वह पैदा ही जहन्नम में झोंके जाने के लिए हुए हैं, इलाज सिर्फ यह है कि मुसलमान होकर मुहम्मद और उनके कुराशों को टेक्स दें और उनके लिए जेहाद करके दूसरों को लूटें मारें जब तक कि वह भी उनके साथ जेहादी न बन जाएँ. ना करदा गुनाहों के लिए बख्शाइश का अनूठा फार्मूला जो मुसलमानों को धरातल की तरफ खींचता रहेगा.
''और जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो कहते हैं; हमने सुन लिया और अगर हम इरादा करें तो इसके बराबर हम भी कह लाएं, यह तो कुछ भी नहीं सिर्फ बे सनद बातें हैं जो पहलों से मन्कूल चली आ रही हैं.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत ( ३१)
अल्लाह बने मुहम्मद झूट बोलते हैं कि क़ुरआन किसी अल्लाह का कलाम है क्यूं कि यह खुद इस्लामी अल्लाह हैं और क़ुरआन इन का फूहड़ कलाम है. अरब में तौरेत की पुरानी कहानियाँ सीना दर सीना सदियों से चली आ रही थीं जैसे भारत में पौराणिक कथाएँ. जब मुहम्मद उसे अल्लाह का कलाम गढ़ कर अवाम को सुनाते तो खुद मुसलमान हुए लोगों में ऊब कर कुछ लोग कह देते की ऐसी बे सनद बातें तो हम भी कर सकते हैं जो पहले से मशहूर हैं इनमें नया क्या है? तलवार की काट और हराम खोर ओलिमा की ठाठ, आज मुसलमानों की ज़ुबान पर क़ुफ्ल जड़े हुए है.
'' और जब उन लोगों ने कहा ऐ अल्लाह ! अगर यह आप की तरफ से वाकई है तो हम पर आसमान से पत्थर बरसाए या हम पर कोई दर्द नाक अज़ाब नाज़िल कर दीजिए.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत ( ३२)
और अल्लाह ने अपने बन्दों पर कोई क़हेर न dhaya मुहम्मद बेवकूफ़ी में खुद अपनी बातों को गलत साबित कर रहे हैं.
''और तुम उन कुफ्फारो से इस हद तक लड़ो की उन्हें फ़सादे अक़ीदत न रहे और दीन अल्लाह का ही क़ायम हो जाए, फिर अगर वह बअज़ आ जाएँ तो अल्लाह उनके अअमाल को खूब देखते हैं.''
सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत ( ३९)
अम्न पसंद मुसलामानों ! आयत पर गौरो-खौज़ करो। मक्की मुहम्मद की चालों को समझो, वह सिर्फ अपने मक्र के साथ मक्कियों और खास कर कुरैश्यों के लिए थे। उनकी लूट मार की सियासत अक्सरियत जाहिलों का ज़रीआ मुआश बन कर शरीफों, ईमानदारों और मजबूरों पर ग़ालिब होते हुए बे ज़मीर आलिमों के ज़रीए मजहब यानी धर्म जैसी मुक़द्दस चीज़ बन गया. सामने आओ, तरके इस्लाम करो, मज़हब इस वक़्त दुन्या की सबसे बद तरीन अलामत है, इंसानियत ही इस वक़्त बनी नौअ इंसान का सब से बड़ा मज़हब है. हमें अपने कल्चर को बरकरार रखते हुए जदीद तरीन तअलीम का पुजारी बन जाना चाहिए और वक़्त के साथ साथ अपनी नस्लों को बदलते रहने की तअलीम भी देते रहना है. याद रखें की इस्लामी जमूद से अगर न निकले तो तुम्हारी नस्लों की फ़ना यकीनी है.
निसार ''निसार-उल-ईमान'


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ऐतिहासिक सत्य में क़ुरआन की हक़ीक़त



Qur'an 8:15 "Believers, [Muslims] when you meet unbelieving infidels in battle while you are marching for war, never turn your backs to them. If any turns his back on such a day, unless it be in a stratagem of war, a maneuver to rally his side, he draws on himself the wrath of Allah, and his abode is Hell, an evil refuge!" This is like the pseudo-religious Teutonic Oath of the Nazi S.S. It's identical to the mindset of the Kamikaze Divine Wind. Not only are Muslims ordered to attack, they are condemned if they retreat. Islam is a fight to the death.
And lest we forget: Allah hates peaceful Muslims. If you know one, you ought to share this verse with them. They could do better than to follow a god who hates them for doing the right thing.
The following verse is one of many that is meaningless outside of the context the Hadith provides. As you recall, Muslims claimed that Allah's angels severed men's heads before their swords reached them. And we learn: Ishaq:322 "Allah said concerning the pebbles thrown by the Apostle, 'I threw them not you. Your tossing them would have had no effect without My help. But working together, We terrorized the enemy and put them to flight." In that context, I present the Qur'an: Qur'an 8:17 "It is not you [Muslims] who slew them; it was Allah who killed them. It was not you (Muhammad) who threw (a handful of dust), it was not your act, but it was Allah who threw (the sand into the eyes of the enemy at Badr) in order that He might test the [Muslim] Believers by doing them a gracious favor of His Own: for Allah is He Who hears and knows."
By adding the words inside the parenthesis, the Islamic scholars who translated the Qur'an have admitted two things: the Qur'an is senseless without the Sira, and the Sira is scripture. Furthermore, the passage is worse in context, not better. Allah is confessing to a crime. The men that he claimed he killed were neither warriors nor criminals. They were businessmen trying to keep Muslims from stealing their wares. By any sane definition, when he pursued and killed these men he committed an act of first-degree murder - a capital offense. In all civilized societies, murderers are either put to death or separated for life. Shouldn't Allah receive the same sentence?
And as is often the case, the murdering spirit is insane. He said that his rage was a "a gracious favor." So why would Allah confess to such a heinous crime and why did he elect to gloat about his outing with the pirates? The reasons are threefold. First, Lucifer had done all he could. He had manipulated the weather and induced men to behave badly. He was proud of himself - the failing that got him into trouble in the first place. Second, Muhammad was a coward in battle. He hunkered down in his palm-frond hut a safe distance behind the battle lines. He needed to revise history so that his militants would believe that by tossing pebbles he was actually fighting with god. Third, Muhammad took twenty percent of the spoils, a hundred times larger share than any of the combatants. If Allah was the most vicious and prolific killer rather than the pirates, he deserved the largest share.
Qur'an 8:18 "This and surely; Allah weakens the deceitful plots of unbelieving infidels." In order to justify this excrement, Muhammad and Allah had to stupefy their militants first. Good must be made to appear bad, and bad must become good. The "unbelieving infidels" were at Badr to defend their people and protect their property from the bad militants, and yet this good motive is twisted into a "deceitful plot." It's but another Qur'anic lie.
Qur'an 8:19 "(Quraysh Unbelievers!) You asked for a judgment so the judgment came to you. If you desist, it will be best for you. If you return (to the attack), so shall We. And your forces, no matter how large, will fail. For verily Allah is with those who believe Him!" Unable to deliver the threatened Day of Doom, Allah is suggesting that this sandlot skirmish is its equivalent. It is also interesting that this spirit's "judgment" renders booty to criminals. Further, the defensive tactics of the merchants were wrongly twisted into looking like an attack by the delusional spirit. Yet the Meccans were merely safeguarding their wares. The Muslims were on the prowl trying to steal them. This convoluted reasoning is the same strategy modern Muslims foist on an ignorant media. Thus when the Israelis defend themselves from Islamic terror they are recast as the aggressors.
With situational scriptures issued and history twisted, it was time to reinforce the purpose of Islam: Qur'an 8:20 "O you who believe! Obey Allah and His Messenger. Do not turn away from him when you hear him speak. Do not be like those who say, 'We hear.' but do not listen. Those who do not obey are the worst of beasts, the vilest of animals in the sight of Allah. They are deaf and dumb. Those who do not understand are senseless. If Allah had seen any good in them, He would have made them listen. And even if He had made them listen, they would but have turned away and declined submission." When you consider the audience and the circumstance, this is transparent. Muhammad was lashing out against the good people of Medina and calling them bad Muslims for not following his orders to fight. The bad Muslims still knew right from wrong. Their consciences told them that piracy, terrorism, murder, kidnapping, ransom, and thievery were evil. As such, they were "good" people. When the "prophet" spoke to them, commanding them to become pirates, they turned away and did not listen to him.
The good Muslims, however, like their counterparts today, had been corrupted by Islam. They could no longer distinguish between right and wrong so they zealously followed the profiteer on raids to pillage and plunder.
While it is obvious that this demented doctrine needs to be exposed and exterminated - sentenced to die for its crimes - bad Muslims should be leading the parade. Their faux deity just called them the vilest of creatures. Yes, any Muslim who does not follow Muhammad's orders to murder infidels, to pillage and plunder them is deaf and dumb, senseless, the worst of beasts. Allah hates, above all else, peace-loving Muslims (even more than he hates Jews).
I beg any Muslim reading these words to let them sink in. Your god condemns you if you to not lash out in Jihad, if you do not fight to the death for his demented cause. If the Qur'an is true, if Allah is God, if Muhammad was a prophet - and you are a peaceful, loving Muslim - you are destined for a hell even more torturous than that prepared for the hospitality of the infidels. It's a lose-lose game, with your soul at stake. If Islam is true, you're toast. If Islam is a lie, you live in the poverty of a delusional doctrine and will spend eternity separated from Yahweh, your creator. It doesn't have to be that way.
Before we leave this stunning indictment of Islam, I'd like to address the opening salvo of the 20th verse. Muhammad said that any time he speaks he must be believed, followed, and obeyed. Not Allah, him. Even Ishaq agrees: Ishaq:322 "Allah said, 'Do not turn away from Muhammad when he is speaking to you. Do not contradict his orders. And do not be a hypocrite, one who pretends to be obedient to him and then disobeys him. Those who do so will receive My vengeance. You must respond to the Apostle when he summons you to war." Technically, one cannot be a bad Muslim. A peaceful, loving person is either a non-Muslim or a hypocrite. Therefore, all true Muslims obey Islam's dictates and become bad people!
Muhammad's summons was to raid civilians and steal their property. This wasn't holy war; it was terrorism. Also, to follow Muhammad's orders, as Allah is compelling, one must understand the Sunnah and comply with its Hadith. That is the only place the prophet's commands and terrorist example can be found. (Unless you see Muhammad as Allah and in that case the Qur'an is just a redundant Sunnah.) Either way, from this point forward Islam is a terrorist manifesto. Its creed is: obey Muhammad, fight for Muhammad, and pay Muhammad.
Since the last Qur'anic pronouncement was too transparent even for Islam's prophet, the megalomaniac stepped aside momentarily and placed himself back on equal footing with his god: Qur'an 8:24 "O Believers! Answer Allah and (His) Messenger when he calls you to that which will give you life [martyrdom]. And know that Allah comes in between a man and his heart. To Him you shall be gathered. Fear the affliction and trial that awaits those who do not obey. Allah is severe." Yes, all Muslims will meet Allah, the demonic spirit of Islam. Their affliction at his hands will be severe.
Ever deceitful, Muhammad and Allah are calling Muslims to fight to the death for their benefit, yet they say they are being called to life. This reminds me of Satan's temptation in the Garden. The apple represented death yet Lucifer called that choice immortality - life.
Qur'an 8:26 "And remember, when you were a small band [i.e., bandits] and reckoned feeble and despised in the land, and were afraid that men might despoil and kidnap you, carrying you off by force, how He provided a safe asylum for you, strengthened you with His aid. He gave you refuge, and gave you the good [stolen] things, that haply you might be thankful. O you that believe, don't betray Allah and the Messenger, nor misappropriate things entrusted to you." Gloating is unseemly. Muhammad's militants had won a skirmish against some poorly equipped and out-of-shape businessmen. The Muslims were a small band of bandits, feeble and despised before Badr, and they remained so after the battle. No Muslim was carried off by force. They were the kidnappers. As for an asylum, I would be happy to recommend one.
Qur'an 8:28 "And know that your property and your children are just a temptation, and that Allah has the best rewards." The idea that "children are just a temptation" is telling. Is Muhammad suggesting that men might be tempted to abuse their sons as he himself was abused as a child? Or is he asking parents to sacrifice their children and their money on Jihad's altar, as so many Muslims do today? While perverse, neither is as twisted as the notion that god's "best reward" is an inebriated stay in his whorehouse. Nor are they any more evil than an Islamic imam seducing mercenary militants to murder innocents to gain entry.
Qur'an 8:29 "O you who believe! If you obey and fear Allah, He will grant you a criterion to judge between right and wrong, or a way to overlook your evil thoughts and deeds." If you are a good Muslim and obey out of fear, Allah will grant you a new "criterion to judge between right and wrong." And that is because all other religions, moral codes, and societal mores define piracy, murder, plunder, terrorism, kidnapping, thievery, and ransom as evil. But not to worry, O Islamic terrorist, because Allah will forgive your crimes, corrode your mind, and rid you of the pangs of conscience.
Qur'an 8:30 "Remember how the unbelievers [Meccan merchants] plotted against you (O Muhammad), to keep you in bonds, or slay you, or get you out (of your home). They plotted, and Allah too had arranged a plot; but Allah is the best schemer." Because you have read the Hadith and studied the Qur'an in context, you know that Muhammad claimed he "received" this verse two years earlier. And you know that the kidnappers and the slayers were Muslims. As for Allah being the best plotter, a world-class schemer, I couldn't agree more. He is the best in the world at what he does.
Prince Charming says: Ishaq:323 "I am the best of plotters. I deceived them with My guile so that I delivered you from them." Webster defines "guile" the way the Bible defines Satan: "insidious and cunning, a crafty or artful deception, duplicity."
Qur'an 8:31 "When Our Verses are rehearsed to them, they say: 'We have heard this (before) [i.e., it's plagiarized]. If we wished, we could say (words) like these. These are nothing but stories of the ancients.'" The reason the local Arab population in Yathrib was questioning the prophet's credentials was that he had already trotted out the 2nd surah. It was filled with convoluted stories lifted from the pages of the Torah. This verse confirms that bad Muslims were smart enough to recognize a false prophet.
In the next passage we find Muhammad sidestepping the "no miracles-no prophet" and "no signs-no god" criticisms. It's as feeble as ever. Qur'an 8:32 "Remember how they said: 'O Allah, if this (Qur'an) is indeed the Truth (revealed) from You, rain down on us a shower of stones from the sky, or send us a painful doom.' But Allah was not going to send them a penalty while you (Muhammad) were among them. But what plea have they that Allah should not punish them; what makes them so special? They obstructed (men) from the Holy Mosque, though they were not its fitting and appointed guardians? Its custodian can only be one who keeps his duty to Allah. Their prayer and worship at the House of Allah (the Ka'aba) is nothing but whistling and clapping of hands. They will have to taste the punishment because they disbelieved.'" This passage says that pagans believed Allah was God; they prayed to him and worshiped at his House. As such, it destroys Muhammad's justification for killing them.
These verses also contain lies and a confession. The Meccans never restricted access to the mosque. The Ka'aba was the centerpiece of Qusayy's religious scam. It was their meal ticket. The more pilgrims the better. It was Muhammad and his Muslims who were intolerant. They would ultimately restrict access, prohibiting all non-Muslims from entering Mecca. The confession provides additional support for the Profitable Prophet Plan. Muhammad was claiming ownership of the Ka'aba Inc. because he deemed himself more deserving than the rightful owners. He had made a deal with the Devil. Custodianship of Allah's House was to be his reward.
Qur'an 8:36 "The unbelievers spend their wealth to hinder (man) from the Way of Allah, and so will they continue to spend; but in the end they will have intense regrets and sighs. It will become an anguish for them, then they will be subdued. The unbelievers shall be driven into hell in order that Allah may distinguish the bad from the good and separate them. Allah wants to heap the wicked one over the other and cast them into Hell. They are the losers." The Meccan merchants promoted the "way of Allah." Allah's House was all the Quraysh had going for them. But that lie isn't the problem with this verse. Muhammad, on behalf of his spirit, is telling non-Muslims that anguish awaits them, that they will be subdued, forced into submission and then driven into hell. Terror, a living hell, is the legacy of Muhammad.
Even Ishaq sees Allah as demonic: Ishaq:324 "Allah said, 'Leave Me to deal with the liars. I have fetters and fire and food which chokes. I will smote the Quraysh at Badr."
The hateful and violent message of the Qur'an is as clear as Mein Kampf . Qur'an 8:39 "So fight them until there is no more Fitnah (disbelief [non-Muslims]) and all submit to the religion of Allah alone (in the whole world). But if they cease, Allah is Seer of what they do." In or out of context, this is unequivocal. The Islamic war machine must continue to roll until every soul on earth "submits to the religion of Allah." There will be no understandings, no appeasements, no compromises, no treaties. It is surrender or die. And this verse cannot be misinterpreted, corrupted, or dismissed. The order is clear: "Fight until the whole world is in submission to Islam."

Prophet of Doom

7 comments:

  1. मैं आपके लेखों को लगातार पढ़ रहा हूं.

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  2. aap GAJAL ya KAVITA kayon nahi likhte
    plz ek kavita ka blog banaiye magar usme apna pahchan mat chupaiyega DRAM WARAM par gambhir hona chhodiye KAVITA likhiye man shant rahega..aur dusman bhi kam banenge..pahchan bhi chupane ki jarurat nahi padegi lokpriyata badhegi..

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  3. हर्फ़े ग़लत मैं गवाही देता हूं कि तू सबसे बड़े झूठो में से है, और तेरा नाम दुनिया के सबसे बड़े झूठों लिखा जा चुका है।

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  4. सूरः बक़रह
    यह अल्लाह की किताब है, इस में कोई शक नहीं । हिदायत है उन परहेज़गार लोगों के लिये(2)
    जो ग़ैब पर ईमान लाते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं,जो रिज़्क़ हमने उन को दिया है, उस में से ख़र्च करते हैं,(3)
    बंधु मुसलमान तो ईमान रखते ही गैबी चीज़ों पर है अल्लाह, फ़रिश्ते, रिसालत, क़ुरान, इत्यादि
    अल्लाह ने मुहम्मद के ज़रीये साफ़ तौर पर बता दिया है कि हिदायत वही पाऐगा जो अनदेखे ख़ुदा पर ईमान लाऐगा। वह भी क़ुरआन की शुरुआत में। फिर तुम हमें तर्क के ज़रीये क्या बता रहे हों।

    वैसे कितनी रकम मिलती है इस काम के लिये।
    कभी अपने पड़ॊसी की ख़बर ली है कि वह किस हाल में है दुनिया के मुस्लमानों की चिंता बाद में करना।
    इन सभी आयतों में जिन को मारने का हुक्म है उनमे से तूभी एक है।
    आप को जहन्नुम की अग्रिम बशारत अगर इसी हाल में मरे तो।

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  5. अगर तुम्हें लगता है कि ऐसा कलाम कोई भी लिख सकता है ज़रा एक वाक्य बना के दिखाओ। शर्तें- 1.क़ुरआन के किसी आयत की कॉपी नहीं होनी चाहिये। 2.मुहम्मद सल्ल० की कोई बात नहीं होनी चाहिये। 3.आने वाले हज़ारों सालों बाद भी पूर्णतः सत्य साबित होनी चाहिये।
    2.इन्सानियत के लिये लाभकारी होनी चाहिये।
    आपको आपकी पूरी ज़िन्दगी का समय दिया जाता है इस काम के लिये।
    और अगर अपने को बेबस पाते हो तो डरो उस आग से जिसका ईंधन इन्सान और पत्थर हॊंगे।

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  6. ऐ लोगो जो ईमान लाये हो; राईना न कहा करो, बल्कि उनज़ुरना कहो और तवज्जह से बात को सुनो, ये काफ़िर (इन्कार करने वाले) अज़ाब ए अलीम (कठोर यातना) के मुस्तहक़ (अधिकारी) हैं। यह लोग जिन्होनें दावत ए हक़ (सत्य का निमंत्रण) को क़ुबूल करने से इनकार कर दिया था, ख़्वाह अहले किताब (ईसाईयों) में से हों या मुशरिक (बहुदेववादी) हों, हरगिज़ यह पसंद नहीं करते कि तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम पर कोई भलाई नाज़िल हो, मगर अल्लाह जिस को चाहता है, अपनी रहमत के लिये चुन लेता है और वह बड़ा फ़ज़ल फ़रमाने वाला है।
    सूरः बक़रा 104-105

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  7. भारत के विनाश और पतन का कारण केवल ब्राह्मण हैं। मेरे लेखों से यह सच्चाई उजागर होते देखकर जनाब बी. एन. शर्मा परेशान हो गये और किसी मत में विश्वास न रखने के बावजूद वे ब्राह्मणी मायाजाल की रक्षा में कमर कसकर मैदान में कूद गये। उन्होंने इस्लाम के बारे में जो कुछ भी कहा वह केवल इसलिये ताकि लोग इस्लाम के नियमों को मानकर ब्राह्मणी मायाजाल से मुक्त न हो जाएं।
    इस्लाम के युद्धों में कमियां निकालने वालों को डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ का यह लेख देखना चाहिये।
    क्या वेद अहिंसावादी हैं ? - डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ The True Hindu
    नीचे इंद्र और उसके युद्धों का वर्णन करने वाले कुछ मंत्र प्रस्तुत हैं :

    त्वमेतात्र् जनराज्ञो द्विदशाबंधुना सुश्रवसोपजग्मुषः ,
    षष्टिं सहसा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्
    ( ऋग्वेद , 1-53-9 )
    अर्थात हे इंद्र , सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए आए 20 राजाओं और उनके 60,099 अनुचरों को तुमने पराजित कर दिया था ।

    इंद्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः जघान नवतीर्नव ।
    ( ऋग्वेद , 1-84-13 )
    अर्थात अ-प्रतिद्वंदी इंद्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वृत्र आदि असुरों को 8-10 बार नष्ट किया ।

    अहन् इंद्रो अदहद् अग्निः इंद्रो पुरा दस्यून मध्यन्दिनादभीके ।
    दुर्गे दुरोणे क्रत्वा न यातां पुरू सहस्रा शर्वा नि बर्हीत्
    ( ऋग्वेद , 4-28-3 )
    अर्थात हे सोम , तुझे पी कर बलवान हुए इंद्र ने दोपहर में ही शत्रुओं को मार डाला था और अग्नि ने भी कितने ही शत्रुओं को जला दिया था । जैसे किसी असुरक्षित स्थान में जाने वाले व्यक्ति को चोर मार डालता है , उसी प्रकार इंद्र ने हज़ारों सेनाओं का वध किया है ।

    अस्वापयद् दभीयते सहस्रा त्रिंशतं हथैः, दासानिमिंद्रो मायया ।
    ( ऋग्वेद , 4-30-21 )
    अर्थात इंद्र ने अपने कृपा पात्र दभीति के लिए अपनी शक्ति से 30 हज़ार राक्षसों को अपने घातक आयुधों से मार डाला ।

    नव यदस्य नवतिं च भोगान् साकं वज्रेण मधवा विवृश्चत्,
    अर्चंतींद्र मरूतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम ।
    ( ऋग्वेद , 5-29-6 )
    अर्थात इंद्र ने वज्र से शंबर के 99 नगरों को एक साथ नष्ट कर दिया । तब संग्राम भूमि में ही मरूतों ने त्रिष्टुप छंद में इंद्र की स्तुति की । तब जोश में आकर इंद्र ने वज्र से शंबर को पीड़ित किया था ।

    नि गव्यवो दुह्यवश्च पष्टिः शता सुषुपुः षट् सहसा
    षष्टिर्वीरासो अधि षट् दुवोयु विश्वेदिंद्रस्य वीर्या कृतानि
    ( ऋग्वेद , 7-18-14 )
    अर्थात अनु और दुहयु की गौओं को चाहने वाले 66,066 संबंधियों को सेवाभिलाषी सुदास के लिए मारा गया था । ये सब कार्य इंद्र की शूरता के सूचक हैं ।
    वेदों में युद्ध के लिए युद्ध करना बड़े बड़े यज्ञ करने से भी ज़्यादा पुण्यकारी माना गया है । आज तक जहां कहीं यज्ञ होता है , उस के अंत में निम्नलिखित शलोक पढ़ा जाता है ।
    अर्थात अनेक यज्ञ , कठिन तप कर के और अनेक सुपात्रों को दान दे कर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं , अपने जातिधर्म का पालन करते हुए युद्धक्षेत्र में प्राण त्यागने वाले शूरवीर क्षत्रिय उस से भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं ।
    http://vedquran.blogspot.com/2010/04/true-hindu.html

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