Wednesday, 16 June 2010

क़ुरआन सूरह बनी इस्राईल -१७


सूरह बनी इस्राईल -१७
मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह
मुहम्मद की फितरत का अंदाज़ा क़ुरआनी आयतें निचोड़ कर निकाला जा सकता है कि वह किस कद्र ज़ालिम ही नहीं कितने मूज़ी तबा तअबा शख्स थे. क़ुरआनी आयतें जो खुद मुहम्मद ने वास्ते तिलावत बिल ख़ुसूस महफूज़ कर दीं इस एलान के साथ कि ये बरकत का सबब होंगी न कि इसे समझा समझा जाए. अगर कोई समझने की कोशिश भी करता है तो उनका अल्लाह उस पर एतराज़ करता है कि ऐसी आयतें मुशतबह मुराद (संदिग्ध) हैं जिनका सही मतलब अल्लाह ही जनता है. इसके बाद जो अदना(सरल) आयतें हैं और साफ़ साफ़ हैं वह अल्लाह के किरदार को बहुत ही ज़ालिम, जाबिर, बे रहम, मुन्तकिम और चालबाज़ साबित करती है बल्कि अल्लाह इन अलामतों का खुद एलान करता है कि अगर ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' को मानने वाले न हुए तो. अल्लाह इतना ज़ालिम और इतना क्रूर है कि इंसानी खालें जला जला कर उनको नई करता रहेगा , इंसान चीखता चिल्लाता रहेगा और तड़पता रहेगा मगर उसको मुआफ़ करने का उसके यहाँ कोई जवाज़ नहीं है, कोई कांसेप्ट नहीं है. मज़े की बात ये कि दोबारा उसे मौत भी नहीं है कि मरने के बाद नजात कि सूरत हो सके, उफ़! इतना ज़ालिम है मुहमदी अल्लाह? सिर्फ़ इस ज़रा सी बात पर कि उसने इस ज़िन्दगी में ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' क्यूं नहीं कहा. हज़ार नेकियाँ करे इन्सान, कुरआन गवाह है कि सब हवा में ख़ाक की तरह उड़ जाएँगी अगर ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' नहीं कहा क्यों कि हर अमल से पहले ईमान शर्त है और ईमान है ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' . इस कुरआन का खालिक़ कौन है जिसको मुसलमान सरों पर रखते हैं ? मुसलमान अपनी नादानी और नादारी में यकीन करता है कि उसका अल्लाह . वह जिस दिन बेदार होकर कुरआन को खुद पढ़ेगा तब समझेगा कि इसका खालिक तो दगाबाज़ खुद साख्ता अल्लाह का बना हुवा रसूल मुहम्मद है. उस वक़्त मुसलमानोंकी दुन्या रौशन हो जाएगी.
मुहम्मद कालीन मशहूर सूफ़ी ओवैस करनी जिसके तसव्वुफ़ के कद्रदान मुहम्मद भी थे, जिसको कि मुहम्मद ने बाद मौत के अपना पैराहन पहुँचाने की वसीअत की थी, मुहम्मद से दूर जंगलों में छिपता रहता कि इस ज़ालिम से मुलाक़ात होगी तो कुफ्र ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' मुँह पर लाना पड़ेगा. इस्लामी वक्तों के माइल स्टोन हसन बसरी और राबिया बसरी इस्लामी हाकिमों से छुपे छुपे फिरते थे कि यह ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' को कुफ्र मानते थे. मक्के के आस पास फ़तेह मक्का के बाद इस्लामी गुंडों का राज हो गया था. किसी कि मजाल नहीं थी कि मुहम्मद के खिलाफ मुँह खोल सके . मुहम्मद के मरने के बाद ही मक्का वालों ने हुकूमत को टेक्स देना बंद कर दिया कि ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' कहना हमें मंज़ूर नहीं 'लाइलाहा इल्लिल्लाह' तक ही सही है. अबुबकर ख़लीफ़ा ने इसे मान लिया मगर उनके बाद उमर आए और उन्हों ने फिर बिल जब्र ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' पर अवाम को आमादः कर लिया . इसी तरह पुश्तें गुज़रती गईं , सदियाँ गुज़रती गईं, जब्र, ज़ुल्म, ज्यादती और बे ईमानी ईमान बन गया.
आज तक चौदह सौ साल होने को हैं सूफ़ी मसलक ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' को मज़ाक़ ही मानता है, वह अल्लाह को अपनी तौर पर तलाश करता है, पाता है और जानता है किसी स्वयंभू भगवन के अवतार और उसके दलाल बने पैगम्बर के रूप में..
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सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५
मस्जिदे अक़सा तक जिसके गिर्दा गिर्द हम ने बरकतें कर रखी हैं ले गया ताकि हम उनको अपने कुछ अजायब दिखला दें. बेशक अल्लाह तअला बड़े सुनने और देखने वाले हैं. और हमने मूसा को किताब दी और हमने उसको बनी इस्राईल के लिए हिदायत बनाया कि तुम मेरे सिवा किसी और को करसाज़ मत क़रार दो. ऐ उन लोगो की नस्ल! जिन को हमने नूह के साथ सवार किया था वह बड़े शुक्र गुज़र बन्दे थे. और हमने बनी इस्राईल को किताब में बतला दी थी कि तुम सर ज़मीन पर दोबारा खराबी करोगे और बड़ा ज़ोर चलाओगे. फिर जब उन दो में से पहली की मीयाद आवेगी, हम तुम पर ऐसे बन्दों को मुसल्लत कर देंगे जो बड़े जंगजू होंगे. फिर वह तुम्हारे घरों में घुस पड़ेंगे और ये एक वतीरा है जो हो कर रहेगा.
सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५ आयत (१-५)
पाठको क्या समझे? तर्जुमा कर शौकत अली थानवी ने ब्रेकेट की खपच्चियाँ लगा लगा कर बड़ी रफ़ू गरी की मगर जब जेहालत सर पर चढ़ कर बोले तो कौन मुँह खोले? अल्लाह कहता है ''हम तुम पर ऐसे बन्दों को मुसल्लत कर देंगे जो बड़े जंगजू होंगे. फिर वह तुम्हारे घरों में घुस पड़ेंगे और ये एक वतीरा है जो हो कर रहेगा.'' यानि अल्लाह का भी वतीरा होता है? बाद किमाश सियासत दानों की तरह, वह खुद जंगजू तालिबान को पैदा किए हुए है, जो मासूम बच्चियों को इल्म के लिए घरों से बाहर तो निकलने नहीं देते और घरों में ऐसी आयतों का सहारा लेकर घुस जाते हैं और मनमानी करते हैं.
मुसलमानों तुम कितने बाद नसीब हो कि तुम्हारी आँखें ही नहीं खुलतीं. कितने बेहिस हो? कितने डरपोक? कितने बुजदिल? कितने अहमक हो ? जागो, अभी तो तुमको तुम में से ही जगा हुवा एक मोमिन जगा रहा है, मुमकिन है कि कल दूसरों के लात घूंसे खा कर तुम्हारी आँखें खुलें.
''फिर उन पर तुम्हारा गलबा कर देंगे और मॉल और बेटों से हम तुम्हारी मदद करेगे और हम तुम्हारी जमाअत को बढ़ा देंगे. अगर अच्छे कम करते रहोगे तो अपने ही नफ़े के लिए अच्छे कम करोगे. और अगर बुरे कम करोगे तो भी अपने लिए, फिर जब पिछली की मीयाद आएगी ताकि तुम्हारे मुँह बिगाड़ दें और जिस तरह वह पहली बार मस्जिद में घुसे थे, यह लोग भी इस में घुस पड़ें और जिन जिन पर इनका ज़ोर चले सब को बर्बाद कर डालें. अजब नहीं कि तुम्हारा रब तुम पर रहेम फरमा दे और अगर वही करोगे तो हम फिर वही करेंगे और हमने जहन्नम को काफिरों का जेल खाना बना रखा है. बिला शुबहा ये कुरआन ऐसे को हिदायत देता है जो बिलकुल सीधा है. और ईमान वालों को जो कि नेक कम करते हैं, ये खुश खबरी देता है कि उसको बहुत बड़ा सवाब है. और जो आखरत पर ईमान नहीं लेट उनके लिए दर्दनाक सजा तैयार है,
सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५ आयत (६-१०)
ये है कुरानी अल्लाह की ज़ेहन्यत और इस्लाम की रूह. ऐसी तसवीर लेकर आप ज़माने के सामने जाकर इस्लाम की तबलीग़ करने लायक़ तो रह नहीं गए कि इसमें कुछ दम नहीं और इसे सब जान चुके है और इससे बुरे इस्लामी एहकाम को भी, लिहाज़ा अब तगलीगिए मुसलमानों के मुहल्लों में ही जा कर उनके नव उम्रों को भड़काते फिरते हैं कि अल्लाह तुम को जैशे मुहम्मद की तरफ़ बुला रहा है. इस तरह एक नया ख़तरा मुसलमानों पर आन खड़ा हवा है. ज़रुरत है निडर होकर मैदान में आने की , इस एलान के साथ कि आप हसन बसरी की तरह सिर्फ़ मोमिन हैं. जाइए आपको जो करना हो कर लीजिए. आप जागिए और लोगों को जगाइए.
''और हमने रात और दिन को दो निशानियाँ बनाया, सो रात की निशानी को तो हमने धुंधला बनाया और दिन की निशानी को हमने रौशन बनाया ताकि तुम अपने रब कि रोज़ी तलाश करो और ताकि तुम बरसों का शुमार और हिसाब मालूम कर लो और हम ने हर चीज़ को खूब तफ़सील के साथ बयान कर दिया है. ''
सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५ आयत (१२)
मुहम्मद रात को कोई ऐसी शय मानते हैं जो ढक्कन नुमा होती हो और रौशनी को ढक कर उस पर ग़ालिब हो जाती हो और दिन को एक रौशन शय जो आकर सूरज को रौशन कर देता हो,जैसे बल्ब में फिलामेंट. हदीसें बतलाती हैं कि वह सूरज को रात में मसरुफे सफ़र जानिबे अल्लाह बराय सजदा रेज़ी होना जानते हैं. मुहम्मद कहते हैं ''हमने दिन को रौशन बनाया ताकि तुम अपने रब कि रोज़ी तलाश करो'' बन्दे का रब उसकी तलाश कि हुई कौन सी रोज़ी खाता है? मुतरजजिम लिखता है गोया बन्दों कि रोज़ी. अब वक़्त फराहम करता है.अब रात पायली काम होने लगे, बरसों का शुमार और हिसाब रात और दिन पर कभी मुनहसर नहीं रहे. मुसलमान सच मुच इतना ही पीछे है जितना इसका कुरान इसे अपनी बेहूदा तफसीलो में मुब्तिला किए हुए है.
''हर इंसान को आमल नामे के मुताबिक सज़ा मिलेगी, साथ में अल्लाह ये भी सहेज देता है कि ''और हम सज़ा नहीं देते जब तक किसी रसूल को नहीं भेज लेते.''
गोया अल्लाह पाबन्द है रसूलों का कि वह आकर मुझे जन्नतयों कि लिस्ट दे. यहाँ पर भी मुहम्मद भोले भालों को चूतिया बनाते हैं कि फ़िलहाल तुम्हारा रसूल तो मैं ही हूँ. असली दीन की अदालत में जिस दिन मुक़दमा चलेगा, मुहम्मद सब से बड़ेजहन्नमी साबित होंगे.
अल्लाह कहता है''जो शख्स दुन्या की नीयत रखेगा हम उस शख्स को दुन्या में जितना चाहेंगे, जिसके वास्ते चाहेंगे, फ़िलहाल देदेंगे फिर उसके लिए हम जहन्नम तजवीज़ करेंगे और वह उस में बदहाल रांदे दरगाह होकर दाख़िल होगा.और जो शख्स आख़िरत की नीयत रखेगा और इसके लिए जैसी साईं करना चाहिए वैसी ही साईं करेगा बशर्ते ये कि वह शख्स मोमिन भी हो, सो ऐसे लोगों की ये साईं मकबूल होगी.'' यहाँ पर पहली बात तो ये साबित होती है कि मुहम्मदी अल्लाह परले दर्जे का शिकारी है कि शिकार के लिए दाना डालता है, आदमी दाना चुगने लगे और चैन कि साँस ले कि वह इसको दबोच लेता है? दूसरी बात कि जैसे मैं पहले बयान करचुका हूँ कि आप लाख नेक इन्सान हों, अल्लाह से इसका कोई वास्ता नहीं अगर आप मोमिन ''मुहम्मदुर रसूल्लिल्लाह'' कहने वाले नहीं.
सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५ आयत (१३-२२)
''अल्लाह अपने बालिग़ बच्चों को समझाता है कि माँ बाप के फ़रायज़ याद रखना, उनसे हुस्ने सुलूक से पेश आना, क़राबत दारों के हुक़ूक़ भी याद दिलाता है, फुज़ूल खर्ची को मना करता है मगर बुखालत को भी बुरा भला कहता है, मना करता है कि औलादों को तंग दस्ती के बाईस मार डालना भरी गुनाह है, ज़िना कारी को बे हयाई बतलाता है. साथ साथ अपनी अज़मत को ख़ुद अपने मुँह से बघारना नहीं भूलता. ''
सूरह बनी इस्राईल -१७, पारा-१५ आयत (२३-३२)
जिस तरह बच्चों को एखलाकयात सिखलाया और पढाया जाता है उसी तरह मुहम्मद कुरआन के ज़रीए मुसलामानों को सबक़ देते हैं लगता है उस वक़्त अरब में सब जंगली और वहशी रहे होंगे. ख़ुद दूसरों को नसीहत देने वाले मुहम्मद अपने चचाओं पर कैसा ज़ुल्म ढाया कोई तवारीख़ से पूछे. ज़िना कारी और हराम कारी को बे हयाई गिनवाने वाले मुहम्मद पर दस्यों इलज़ाम हैं कि इसके कितने बड़े मुजरिम वह ख़ुद थे. हदीस है ''जो शख्स मेरे वास्ते दो चीज़ों का जामिन हो जाय ,पहली दोनों जबड़ों के दरमियान जो ज़ुबान है, दूसरी दोनों पैरों के बीच जो शर्मगाह(लिंग) है तो मैं उस शख्स के वास्ते जन्नत का जामिनदार हो जाऊँगा. (बुखारी २००७)
अपनी फूफी ज़ाद बहन ज़ैनब जोकि इनके मुँह बोले बेटे की बीवी थी के साथ मुँह काला करते हुए उसके शौहर ज़ैद बिन हारसा ने पकड़ा तो तूफ़ान खड़ा हुवा, ,जिंदगी भर उसको बिन निकाही बीवी बना के रक्खा और चले हैं बातें करने.

8 comments:

  1. मोमिन : एक क्रांति का नाम है. मोमिन ने इस्लाम के कुत्तों को उनकी औकात बता दी है.
    इस्लाम अय्याशी और हिंसा का मजहब है. इसको मानने वाले मुहम्मद उमर कैरान्वी, जमाल, असलम कासमी, सलीम खान, अयाज अहमद, सफत आलम, एजाज इदरीसी, जीशान, इम्पैक्ट, खुर्सीद जैसे देशद्रोही, कृतध्न, जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं, ब्लोगों पर हिन्दुओं के विरुद्ध इतना विष वामन करते हैं तो इनकी मस्जिदों में क्या नही होता होगा? कोई भी अनुमान लगा सकता है. विदेश से पैसा लेकर इस्लाम का प्रचार और हिन्दू धर्म का अपमान कर रहे हैं.

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  2. @Islam Ki Duniya
    तेरे और हरामुन(मोमिन) जैसे कुत्ते इस्लाम पर हज़ारों साल से यूं ही भौंकते चले आ रहे हैं. लेकिन इस्लाम वह सूरज है जिसकी तरफ बुरी नज़र से देखने वाली हराम की औलादें अंधी हो जाती हैं.

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  3. मोमिन! दिल चाहता है तुम पर ईमान ले आऊँ

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  4. चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
    बलिहारी जाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

    सदा बहार सजीला है रसूल मेरा
    हो लाखपीर रसीला है रसूल मेरा
    जहे जमाल छबीला है रसूल मेरा
    रहीने इश्क रंगीला है रसूल मेरा

    चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
    बलिहारी जाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

    किसी की बिगड़ी बनाना है ब्याह कर लेंगे
    बुझा चिराग जलाना है ब्याह कर लेंगे
    किसी का रूप सुहाना है ब्याह कर लेंगे
    किसी के पास खजाना है ब्याह कर लेंगे

    चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
    बलिहारीजाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

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  5. आप स्वयं निर्णय कर लीजिये कि नारी आज खुश है या प्राचीन काल में खुश थी?
    कृत्या नाम की टोना टुटका वाली स्त्राी का जन्म व मनु वंश के नभग का वंश विस्तार

    मनु पुत्रा नभग से नाभाग पैदा हुआ। जब वह ब्रह्मचर्य का पालन करके लौटा, तब तक मनु की सारी सम्पत्ति बंट चुकी थी। उसके भाइयों ने कहा कि तुम्हारे हिस्से में पिता हैं। उसने यह बात नभग अपने पिता को बतायी। उसने कहा कि आंगिरस नाम के ब्राह्मण इस समय यज्ञ कर रहे हैं। पर छः दिन बाद, वे कर्म भूल जाते हैं। तुम उन्हें वैश्रदेव सम्बंधी दो सूत्रा बता दो। वे यज्ञ का बचा धन तुम्हें दे देंगे।
    उसने वैसे ही किया। जब यज्ञ का धन लेने लगा तो एक काले रंग का व्यक्ति आया और उसने यज्ञ भाग लेने से उसे मना किया। कहा ये मेरा हिस्सा है। मैं रुद्र हूं। यज्ञ का बचा हुआ हिस्सा छोड़ कर वह पुनः पिता के पास आया। पिता ने कहा कि यह पहले ही तय हो चुका है कि यज्ञ का बचा हुआ भाग महादेव का है। इसलिए रुद्र उसे बटोरने आया होगा। नाभाग ने पिता की बात स्वीकार ली।
    नाभाग के पुत्रा का नाम अम्बरीष था। उसका भारत के प्रायद्वीपों पर राज्य हो गया था। वह श्रीकृष्ण का भक्त था। उसने बड़े बड़े यज्ञ कराये तथा असित,वशिष्ठ और गौतम आदि आचायोर्ं को उस यज्ञ में आमंत्रिात किया करता था। असित सिद्धार्थ के समय में थे। तथागत बुद्ध उनसे शास्त्राार्थ करना चाहते थे। लेकिन वे मर चुके थे। अम्बरीष का भी ईसा पूर्व 700 ई. का काल बनता है। वही काल कृष्ण का भी है। वह धार्मिक व्यक्ति था। अध्यात्म के प्रति उसकी रुचि थी। सारा संसार नाशवान लगता था। श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र नामक व्यक्ति को उसके पास भेज कर उसके राज्य की रक्षा कराते थे। क्योंकि वह कृष्ण अधीन हो गया था।
    एक बार उसने यमुना के किनारे मधुवन (मथुरा) में कार्तिक के महीने में पत्नी सहित तीन दिन तक उपवास किया। महाभिषेक विधि से कृष्ण को अपनी सभी सम्पत्ति का अभिषेक कर दिया। शेष गायें आदि ब्राह्मणों को दान कर दीं। वहीं पर क्रोधी ऋषि दुर्वासा आ गये। उसने उन्हें भोजन के लिए राजी कर लिया। लेकिन दुर्वासा यमुना में स्नान करके ब्रह्मलीन हो गये। इधर द्वादशी समाप्त होने वाली थी। उसने ब्राह्मणों से परामर्श किया कि बिना ब्राह्मणों को खिलाये मैं कैसे जल व भोजन ग्रहण कर सकता हूं क्योंकि दुर्वासा ब्रह्मलीन हो गये हैं।
    ब्राह्मणों ने सलाह दी कि तुम जल या भोजन ले सकते हो, नहीं भी ले सकते हो। उसने ब्राह्मणों की सलाह मान कर पानी पी लिया। इधर दुर्वासा पूजा पाठ से निवृत्त हो, भोजन के लिए तैयार हुए थे। लेकिन उसे पता चला कि राजा ने पानी पी लिया है तो दुर्वासा को क्रोध आ गया। बिना ब्राह्मण को खिलाये, इसने पानी कैसे पी लिया। उसने अपनी जटा उखाड़ी और कृत्या नाम की स्त्राी उत्पन्न की। वह काली थी। वह तलवार लेकर राजा अम्बरीष पर टूट पड़ी। लेकिन अम्बरीष हटा नहीं। वह वहीं खड़ा रहा। इधर उसके रक्षक सुदर्शन ने कृत्या की हत्या कर दी और दुर्वासा को दौड़ा लिया। वह भागता हुआ ब्रह्मा के पास गया। ब्रह्मा ने उसकी रक्षा करने से इनकार कर दिया। वह शंकर के पास गया। शंकर ने भी उसकी रक्षा करने से इनकार कर दिया। अंत में वह विष्णु के पास गया।
    विष्णु ने कहाᄉ मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूं। मुझमें तनिक भी स्वतंत्राता नहीं है। तुम अम्बरीष से क्षमा मांगो।
    दुर्वासा भाग कर फिर अम्बरीष के चरणों में गिर गये। इस प्रकार इसकी जान बची।
    http://buddhambedkar.blogspot.com/2010/06/aryon-se-yuddha-karne-wale-kaun.html

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  6. मंधाता की पत्नी शशिबिन्दु से बिन्दुमती नाम की लड़की हुई। उससे पुरुकुत्स, अम्बरीष (द्वितीय) तथा मुचुकुंद हुए। तथा इनके पचास बहनें थीं। पचासों बहनों के साथ सौभरि ब्राह्मण ने विवाह कर लिया। कहानी इस प्रकार हैᄉ एक बार एक मल्लाह यमुना नदी के पास अपनी पत्नियों के साथ विहार कर रहा था। वहीं सौभरि ब्राह्मण जल में खड़े तपस्या कर रहे थे। निषाद को जलक्रीड़ा करते देख वह कामांध हो गया। वहां से राजा मंधाता के पास गया और मंधाता से एक कन्या का विवाह अपने साथ करने को कहा।
    राजा ने कहा कि इनमें से कोई पसंद कर लें और विवाह कर लीजिए। ब्राह्मण बूढ़ा और कमजोर था। नसें दिखाई पड़ रही थीं। आंखें कमजोर, बाल सफेद हो गये थे। उसने कहा मुझे पचासों पसंद हैं। उसने पचासों उस बूढ़े ब्राह्मण सौभरि को दे दीं।
    उस समय क्षत्रिायों के यहां लड़कियां मार दी जाती थीं। ब्राह्मणों को बिना ब्याहे ही दान दे दिया करते थे। पचासों लड़कियां उस बूढ़े ब्राह्मण के साथ जंगल चली गयीं। घुट घुट कर मर गयीं।
    मंधाता के पुत्राों में अम्बरीष था। मंधाता के वंश तीन अवांतर गोत्राों के प्रवर्तक हुए। पुरुकुत्स का विवाह नर्मदा नाम की कन्या जो, नागवंश की थी, के साथ हुआ। वह दक्षिणी भारत का राजा था। उससे त्रासदस्यु, त्रासदस्यु से अनरण्य, अनरण्य से हर्यश्रव उसके अरुण और त्रिाबंधन हुए। त्रिाबंधन से सत्यव्रत हुआ। वही पिता व गुरु की आज्ञा न मानने पर चांडाल हो गया। यहीं से चांडाल वंश चला। उसे देवताओं ने स्वर्ग से ढकेल दिया। वह बीच में लटक गया। अर्थात्‌ न शूद्र रहा न आर्य। वह चांडाल हो गया तो शव जलाने का काम करता था। उसे ही त्रिाशंकु कहते हैं।
    हरिश्चंद्रᄉ त्रिाशंकु का पुत्रा हरिश्चंद्र था। वरुण देव की कृपा से उसके रोहित नाम का पुत्रा हुआ। यह वही हरिश्चंद्र हैं जिन्हें सत्यवादी कहा जाता है। वास्तविकता यह है कि वे काशी में चांडाल के यहां बेचे नहीं गये थे। बल्कि विश्वामित्रा द्वारा छल से राजपाट छीन लिए जाने के बाद अपने रिश्तेदार काशी के कालू डोम के यहां पत्नी सहित रहने लगे थे और श्मशान घाट में मुर्दे जलाते थे।
    वरुण ने पुत्रा उत्पन्न करने के पूर्व हरिश्चंद्र से उसके पुत्रा को यज्ञ में यजन करने का वादा कराया था। यजन का अर्थ बलि से है। रोहित को यज्ञ पशु मान कर जन्म के दस दिन बाद उसे यज्ञ में बलि के लिए कहा।
    हरिश्चंद्र ने कहा यज्ञ पशु के जब दांत निकल आयेंगे, तब यज्ञ योग्य होगा।
    जब दांत आ गये तब वरुण ने कहा अब बलि के लिए दो। हरिश्चंद्र ने कहा जब दांत गिर जायेंगे, तब यज्ञ योग्य होगा। दूध के दांत गिर गये। वरुण ने फिर वही बात दोहरायी। हरिश्चंद्र ने कहा पुनः दांत उग आने पर बलि के योग्य होगा।
    दांत आने पर हरिश्चंद्र ने कहा कि क्षत्रिाय पशु तब यज्ञ के योग्य होता है जब कवच धारण करने लगे। इस तरह वरुण चांडाल वंश को नष्ट करना चाहता था।
    रोहित को पता चला कि वरुण मुझे बलि दिलाना चाहता है तो वह अपने प्राणों की रक्षा में धनुष लेकर जंगल चला गया। वरुण ने नाराज होकर हरिश्चंद्र पर आक्रमण कर दिया। रोहित ने अपने पिता की सहायता के लिए वन से लौटना चाहा तो इंद्र ने रास्ते में मना कर दिया। जितनी बार रोहित घर लौटने की सोचता, इंद्र बूढ़ा ब्राह्मण बन कर उसको रोक देता।
    इधर वरुण को मझले पुत्रा शुनशेय को देकर यज्ञ पुत्रा बना कर उसकी बलि दी। उस यज्ञ में विश्वामित्रा होता थे। जमदग्नि, वशिष्ठ, ब्रह्मा आदि यज्ञ में शामिल थे। उसके मझले पुत्रा की बलि से इंद्र आदि प्रसन्न थे।
    इतनी निर्दयी कथाओं को सुन कर हिन्दू समाज प्रसन्न होता है। एक भी हिन्दू ऐसा नहीं है जो इनके घृणित कार्यों की निन्दा करे। इतनी कठोर यातनाएं देने के बाद हरिश्चंद्र को राज्य का अवसर दिया।

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  7. भारत के विनाश और पतन का कारण केवल ब्राह्मण हैं। मेरे लेखों से यह सच्चाई उजागर होते देखकर जनाब बी. एन. शर्मा परेशान हो गये और किसी मत में विश्वास न रखने के बावजूद वे ब्राह्मणी मायाजाल की रक्षा में कमर कसकर मैदान में कूद गये। उन्होंने इस्लाम के बारे में जो कुछ भी कहा वह केवल इसलिये ताकि लोग इस्लाम के नियमों को मानकर ब्राह्मणी मायाजाल से मुक्त न हो जाएं।
    इस्लाम के युद्धों में कमियां निकालने वालों को डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ का यह लेख देखना चाहिये।
    क्या वेद अहिंसावादी हैं ? - डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ The True Hindu
    नीचे इंद्र और उसके युद्धों का वर्णन करने वाले कुछ मंत्र प्रस्तुत हैं :

    त्वमेतात्र् जनराज्ञो द्विदशाबंधुना सुश्रवसोपजग्मुषः ,
    षष्टिं सहसा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्
    ( ऋग्वेद , 1-53-9 )
    अर्थात हे इंद्र , सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए आए 20 राजाओं और उनके 60,099 अनुचरों को तुमने पराजित कर दिया था ।

    इंद्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः जघान नवतीर्नव ।
    ( ऋग्वेद , 1-84-13 )
    अर्थात अ-प्रतिद्वंदी इंद्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वृत्र आदि असुरों को 8-10 बार नष्ट किया ।

    अहन् इंद्रो अदहद् अग्निः इंद्रो पुरा दस्यून मध्यन्दिनादभीके ।
    दुर्गे दुरोणे क्रत्वा न यातां पुरू सहस्रा शर्वा नि बर्हीत्
    ( ऋग्वेद , 4-28-3 )
    अर्थात हे सोम , तुझे पी कर बलवान हुए इंद्र ने दोपहर में ही शत्रुओं को मार डाला था और अग्नि ने भी कितने ही शत्रुओं को जला दिया था । जैसे किसी असुरक्षित स्थान में जाने वाले व्यक्ति को चोर मार डालता है , उसी प्रकार इंद्र ने हज़ारों सेनाओं का वध किया है ।

    अस्वापयद् दभीयते सहस्रा त्रिंशतं हथैः, दासानिमिंद्रो मायया ।
    ( ऋग्वेद , 4-30-21 )
    अर्थात इंद्र ने अपने कृपा पात्र दभीति के लिए अपनी शक्ति से 30 हज़ार राक्षसों को अपने घातक आयुधों से मार डाला ।

    नव यदस्य नवतिं च भोगान् साकं वज्रेण मधवा विवृश्चत्,
    अर्चंतींद्र मरूतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम ।
    ( ऋग्वेद , 5-29-6 )
    अर्थात इंद्र ने वज्र से शंबर के 99 नगरों को एक साथ नष्ट कर दिया । तब संग्राम भूमि में ही मरूतों ने त्रिष्टुप छंद में इंद्र की स्तुति की । तब जोश में आकर इंद्र ने वज्र से शंबर को पीड़ित किया था ।

    नि गव्यवो दुह्यवश्च पष्टिः शता सुषुपुः षट् सहसा
    षष्टिर्वीरासो अधि षट् दुवोयु विश्वेदिंद्रस्य वीर्या कृतानि
    ( ऋग्वेद , 7-18-14 )
    अर्थात अनु और दुहयु की गौओं को चाहने वाले 66,066 संबंधियों को सेवाभिलाषी सुदास के लिए मारा गया था । ये सब कार्य इंद्र की शूरता के सूचक हैं ।
    वेदों में युद्ध के लिए युद्ध करना बड़े बड़े यज्ञ करने से भी ज़्यादा पुण्यकारी माना गया है । आज तक जहां कहीं यज्ञ होता है , उस के अंत में निम्नलिखित शलोक पढ़ा जाता है ।
    अर्थात अनेक यज्ञ , कठिन तप कर के और अनेक सुपात्रों को दान दे कर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं , अपने जातिधर्म का पालन करते हुए युद्धक्षेत्र में प्राण त्यागने वाले शूरवीर क्षत्रिय उस से भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं ।
    http://vedquran.blogspot.com/2010/04/true-hindu.html

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  8. डा. साहब फ़िलहाल अपने समाज पर नज़र डाली. उनके यहाँ बहुत समाज सुधारक हो चुके हैं. कि एक हाथ का लम्बा घूंघट उनकी औरतों ने ख़त्म करके आज मर्दों के सहने बशाने कल्पना चावला बन चुकी हैं. कोई फतवा देने की हिम्मत नहीं कर सकता. आप वेदों और उपनिषदों में अपना वक़्त बरबाद न करिए. वह उनके लिए कुरआन की तरह पूज्य नहीं बल्कि अपने बुजुर्गों कि धरोहर हैं जिसमें अच्छी या बुरी कुछ बात तो है, चंडू खाने की बकवास तो नहीं.

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