Monday, 28 June 2010

क़ुरआन -सूरह कुहफ़ १८

सूरह कुहफ़ १८


18The Cave



मेरी तहरीर में - - -



क़ुरआन का अरबी से उर्दू तर्जुमा (ख़ालिस) मुसम्मी(बमय अलक़ाब)


'' हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी'' का है,


हदीसें सिर्फ ''बुख़ारी'' और ''मुस्लिम'' की नक्ल हैं,


तबसरा ---- जीम. ''मोमिन'' का है।


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यह जहन्नुमी आलिमाने-दीन



क़यामत के दिन तमाम इस्लामी ओलिमा और आइमा को चुन चुन कर अल्लाह जब जहन्नम रसीदा कर चुकेगा तो ही उसके बाद दूसरे बड़े गुनाहगारों की सूची-तालिका अपनी हाथ में उठाएगा. यह (तथा कथित धार्मिक विद्वान) टके पर मस्जिद और कौडियों में मन्दिर ढ़ा सकते हैं। ये दरोग़, क़िज़्ब, मिथ्य और झूट के यह मतलाशी, शर और पाखंड के खोजी हुवा करते हैं। इनकी बिरादरी में इनके गढे झूट का जो काट न कर पाए वही सब से बड़ा आलिम होता है। यह इस्लाम के अंतर गत तस्लीम शुदा इल्म के आलिम होते हैं यथार्थ से अपरिचित यानी कूप मंडूक जिसका ईमान से कोई संबंध नहीं होता। लफ्ज़ ईमान पर तो इस्लाम ने कब्जा कर रखा है, ईमान का इस्लामी-करण कर लिया गया है, वगरना इस्लाम का ईमान से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। ईमान धर्म-कांटे का निकला हुवा सच है, इस्लाम किसी अल्प-बुद्धि की बतलाई हुई ऊल-जुलूल बातें हैं, जिसको आँख मूँद कर तस्लीम कर लेना इस्लाम है।
अमरीकी प्रोफेसर सय्यद वकार अहमद हुसैनी कहते हैं "कुरान की 6226 आयातों में से 941 पानी के विज्ञानं और इंजीनयरिंग से संबध हैं, 1400 अर्थ शास्त्र से, जब कि केवल 6 रोजे से हैं और 8 हज से।"
प्रोफेसर हुसैनी का ये सफेद झूट है, या प्रोफ़सर हुसैनी ही फर्ज़ी अमरीकी प्रोफ़सर हैं, जैसा कि ये धूर्त इस्लामी विद्वान् अक्सर ऐसे शिगूफे छोड़ा करते हैं । कुरआन कहता है
"आसमान ज़मीन की ऐसी छत है जो बगैर खंभे के टिका हुआ है. ज़मीन ऐसी है कि जिस में पहाडों के खूटे ठुके हुए हैं ताकि यह अपनी जगह से हिले-डुले नहीं" और "इंसान उछलते हुए पानी से पैदा हुवा है" क़ुरआन में यह है इंजीनयरिंग और पानी का विज्ञान जैसी बातें। इसी किस्म के ज्ञान (दर अस्ल अज्ञान) से क़ुरआन अटा पडा है जिस पर विश्वास के कारण ही मुस्लिम समाज पिछड़ा हुवा है. मलऊन ओलिमा इन जेहाल्तो में मानेयो-मतलब पिरो रहे हैं. हकीक़त ये है की क़ुरआन और हदीस में इंसानी समाज के लिए बेहद हानि कारक, अंधविश्वास पूर्ण और एक गैरत मंद इंसान के लिए अपमान जनक बातें हैं, जिन्हें यही आलिम उल्टा समझा समझा कर मुस्लिम अवाम को गुमराह किया करते है। अभी पिछले दिनों एन डी टी वी के प्रोग्राम में हिदुस्तान की एक बड़ी इस्लामी जमाअत के दिग्गज और ज़िम्मेदर आलिम महमूद मदनी, जमाअत का प्रतिनिधित्व करते हुए भरी महफ़िल में अवाम की आंखों में धूल झोंक गए। बहस का विषय तसलीमा नसरीन थी। मौलाना तसलीमा की किताब को हवा में लहराते हुए बोले,"तसलीमा लिखती है 'उसने अपने बहू से शादी की " गुस्ताख को देखो हुज़ूर की शान में कैसी बे अदबी कर रही है।" ( मदनी को मालूम नहीं कि अंग्रेज़ी से हिन्दी तर्जुमा में यही भाषा होती है।) आगे कहते है "हुज़ूर की (पैगम्बर मुहम्मद की ) कोई औलादे-नरीना (लड़का) थी ही नही तो बहू कैसे हो सकती है ?" बात टेकनिकल तौर पर सच है मगर पहाड़ से बड़ा झूट, जिसे लाखों दर्शकों के सामने एक शातिर और अय्यार मौलाना बोलकर चला गया और अज्ञात क़ौम ने तालियाँ बजाईं। उसकी हकीक़त का खुलासा देखिए----- किस्से की सच्चाई ये है कि ज़ैद बिन हारसा एक मासूम गोद में उठा लेने के लायक बच्चा हुवा करता था। उस लड़के को बुर्दा फरोश (बच्चे चुराने वाले) पकड़ कर ले गए और मुहम्मद के हाथों बेच दिया। ज़ैद का बाप हारसा बेटे के ग़म में परेशान ज़ारों-क़तार रोता फिरता। एक दिन उसे पता चला कि उसका बेटा मदीने में मुहम्मद के पास है, वह फिरोती की रक़म जिस कदर उससे बन सकी लेकर अपने भाई के साथ,मुहम्मद के पास गया। ज़ैद बाप और चचा को देख कर उनसे लिपट गया। हारसा की दरखास्त पर मोहम्मद ने कहा पहले ज़ैद से तो पूछो कि वह किया चाहता है ? पूछने पर ज़ैद ने बाप के साथ जाने से इनकार कर दिया, तभी बढ़ कर मुहम्मद ने उसे अपनी गोद में उठा लिया और सब के सामने अल्लाह को गवाह बनाते हुए ज़ैद को अपनी औलाद और ख़ुद को उसका बाप घोषित किया। ज़ैद बड़ा हुवा तो उसकी शादी अपनी कनीज़ ऐमन से कर दी। बाद में दूसरी शादी अपनी फूफी ज़ाद बहन ज़ैनब से की। ज़ैनब से शादी करने पर कुरैशियों ने एतराज़ भी खड़ा किया कि ज़ैद गुलाम ज़ादा है, इस पर मुहम्मद ने कहा ज़ैद गुलाम ज़ादा नहीं, ज़ैद, ज़ैद बिन मुहम्मद है। मशहूर सहाबी ओसामा ज़ैद का बेटा है जो मुहम्मद का बहुत प्यारा था. गोद में लिए हुए उम्र के ज़ैद वल्द मुहम्मद एक अदद ओसामा का बाप भी बन गया और मुहम्मद के साथ अपनी बीवी ज़ैनब को लेकर रहता रहा, बहुत से मुहम्मद कालीन सहाबी उसको बिन मुहम्मद मरते दम तक कहते रहे और आज के टिकिया चोर ओलिमा कहते हैं मुहम्मद की कोई औलादे-नरीना ही नहीं थी. सच्चाई इनको अच्छी तरह मालूम है कि वह किस बात की परदा पोशी कर रहे हैं. दर अस्ल गुलाम ज़ैद की पहली पत्नी ऐमन मुहम्मद की उम्र दराज़ सेविका थी ओलिमा उसको पैगम्बर की माँ की तरह बतला कर मसलेहत से काम लेते है. खदीजा मुहम्मद की पहली पत्नी भी ऐमन की हम उम्र मुहम्मद से पन्द्रह साल बड़ी थीं. ज़ैद की जब शादी ऐमन से हुई, वह जिंस लतीफ़ से वाकिफ भी न था. नाम ज़ैद का था काम मुहम्मद का, चलता रहा. इसी रिआयत को लेकर मुहम्मद ने जैनब, अपनी पुरानी आशना के साथ फर्माबरदार पुत्र ज़ैद की शादी कर दी, मगर ज़ैद तब तक बालिग़ हो चुका था . एक दिन, दिन दहाड़े ज़ैद ने देखा कि उसका बाप मुहम्मद उसकी बीवी जैनब के साथ मुंह काला कर रहा है, रंगे हाथों पकड़ जाने के बाद मुहम्मद ने लाख लाख ज़ैद को पटाया कि ऐमन की तरह दोनों का काम चलता रहे मगर ज़ैद नहीं पटा. कुरआन में सूरह अहज़ाब में इस तूफ़ान बद तमीजी की पूरी तफ़सील है मगर आलिमाने-दीन हर ऐब में खूबी गढ़ते नज़र आएंगे. इसके बाद इसी बहू ज़ैनब को मुहम्मद ने बगैर निकाह किए हुए अपनी दुल्हन होने का एलान किया और कहा कि "ज़ैनब का मेरे साथ निकाह सातवें आसमान पर हुवा, अल्लाह ने निकाह पढ़ाया था और फ़रिश्ता जिब्रील ने गवाही दी।" इस दूषित और घृणित घटना में लंबा विस्तार है जिसकी परदा पोशी ओलिमा पूर्व चौदह सौ सालों से कर रहे हैं। इनके पीछे अल्कएदा, जैश, हिजबुल्ला और तालिबान की फोजें हर जगह फैली हुई हैं। "मुहम्मद की कोई औलादे-नारीना नहीं थी" इस झूट का खंडन करने की हिंदो-पाक और बांगला देश के पचास करोड़ आबादी में सिर्फ़ एक औरत तसलीमा नसरीन ने किया जिसका जीना हराम हो गया है।



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आज मैं आप के सामने मुहम्मद द्वारा गढ़ी एक कहानी को पेश कर रहा हूँ जिस में मुहम्मद की हकीकत है कि वह और उनका अल्लाह कितने अधकचरे थे। इसमें देखने क़ि बात ये है क़ि इसके तर्जुमान ने अल्लाह और मुहम्मद क़ि कितनी मदद की है, कहानी को एक बार ब्रेकट में दिए गए लाल रंग को छोड़ कर पढ़िए, दूसरी बार इस के साथ पढ़िए।आप को अंदाज़ा हो जायगा कि इन ओलिमा ने झूट को सच का रूप देने में इस्लाम की कितनी सहायता क़ि है।
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''और(वह वक़्त याद करो) जब मूसा ने अपने नौकर से फ़रमाया कि मैं(इस सफ़र में) बराबर चला जाऊँगा, यहाँ तक कि इस मौके पर पहुँच जाऊँ जहाँ दो दरया आपस में मिले हैं, या(यूं ही) ज़माना-ए दराज़ तक चलता रहूँगा. पास जब (चलते चलते) दोनों के जमा होने के मौके पर पहुँचे, अपनी मछली को दोनों भूल गए और उस (मछली) ने अपनी राह ली और चल दी। फिर जब दोनों (वहां से) आगे बढ़ गए (तो मूसा ने), अपने नौकर से फ़रमाया कि हमारा नाश्ता लाओ हमको तो इस सफ़र में( यानी आज की मंज़िल में) बड़ी तकलीफ पहुंची. (नौकर ने) कहा कि (लीजिए) देखिए (अजीब बात हुई) जब हम उस पत्थर के करीब ठहरे थे सो मैं (उस) मछली (के तज़करे) को भूल गया और मुझको शैतान ही ने भुला दिया, कि मैं इसका ज़िक्र करता और (वह किस्सा ये हुवा कि) उस (मछली)ने (ज़िदा होने के बाद) दरया में अजीब तौर पर अपनी राह ली. (मूसा ने हिकायत सुन कर) फ़रमाया यही वह मौक़ा है जिसकी हम को तलाश थी. सो दोनों अपने क़दमों के निशान देखते हुए उलटे लौटे. सो(वहां पहुँच कर) उन्हों ने हमारे बन्दों में से एक बन्दे (यानी खिज़िर) को पाया जिनको हमने अपनी(ख़ास) रहमत (यानी मक़बूलियत) दी थी और उनको हमने अपने पास से (एक ख़ास तौर का) इल्म सिखलाया था. मूसा ने (उनको सलाम किया और) उन से फ़रमाया कि क्या मैं आप के साथ रह सकता हूँ? इस शर्त से कि जो इल्मे-मुफ़ीद को (मिन जानिब अल्लाह) आप को सिखलाया गया है, इस में से आप मुझको भी सिखला दें.(इन बुज़ुर्ग ने)जवाब दिया आप को मेरे साथ (रह कर मेरे अफाल पर) सब्र न होगा. और (भला) ऐसे उमूर पर कैसे सब्र करेगे जो आप के अहाते-वाकिफ़यत से बाहर हो. (मूसा ने) फ़रमाया आप इंशा अल्लाह हम को साबिर (यानी ज़ाबित) पाएँगे. और मैं किसी बात में आप के खिलाफ हुक्म नहीं करूँगा, (इन बुज़ुर्ग ने) फ़रमाया (कि अच्छा) अगर आप मेरे साथ रहना चाहते हैं तो (इतना ख़याल रहे कि) फिर मुझ से किसी बात के निसबत कुछ पूछना नहीं, जब तक कि उसके मुतालिक मैं खुद ही इब्तेदाए ज़िक्र न कर दूं . फिर दोनों (किसी तरह) चले, यहाँ तक कि जब कश्ती में सवार हुए तो (इन बुज़ुर्ग ने) इस कश्ती में छेद कर दिया. (मूसा ने) फ़रमाया कि क्या आप ने इस कश्ती में इस लिए छेद किया (होगा) है कि इसके बैठने वालों को गर्क़ करदें? आप ने बड़ी भारी (यानी खतरा की) बात की. (इन बुज़ुर्ग ने) कहा क्या मैं ने कहा नहीं था कि आप को मेरे साथ सब्र न हो सकेगा. (मूसा ने) फ़रमाया (मुझको याद न रहा था सो) आप मेरी भूल (चूक)पर गिरफ़्त न कीजिए और मेरे इस मुआमले में कुछ ज़्यादा तंगी न डालिए. फिर दोनों (कश्ती से उतर कर आगे) चले, यहाँ तक कि जब एक (कमसिन) लड़के से मिले तो (इन बुज़ुर्ग ने) उसको मर डाला . मूसा (घबरा कर) कहने लगे कि आपने एक बेगुनाह को जान कर मार डाला (और वह भी) बे बदले किसी जान के, बे शक आप ने (ये तो) बड़ी बेजा हरकत की. (उन बुज़ुर्ग ने)फ़रमाया क्या मैं ने कहा नहीं था कि आप को मेरे साथ से सब्र न हो सकेगा. (मूसा ने) फ़रमाया कि ( खैर अब के और जाने दीजिए) अगर इस (मर्तबा) आप से किसी अम्र के मुतालिक कुछ पूछूं तो आप मुझको अपने साथ न राखिए. बेशक आप मेरी तरफ से उज़र (की इन्तहा) को पहुँच चुके हैं. फिर दोनों (आगे) चले फिर जब एक गाँव वालों पर गुज़र हुवा तो वहां वालों से खाने को माँगा कि (हम मेहमान है) सो उन्हों ने उनकी मेहमानी से इंकार कर दिया. इतने में इनको वहाँ पर एक दीवार मिली जो गिरा ही चाहती थी कि फिर उन बुज़ुर्ग ने उसको (हाथ के इशारे से) सीधा कर दिया. (मूसा ने) फ़रमाया अगर आप चाहते तो इस (काम)पर कुछ उजरत ही ले लेते.(उन बुज़ुर्ग ने) फ़रमाय कि अब ये वक़्त हमारे और आप के अलहदगी का है ( जैसा कि आपने खुद शर्त की थी) मैं उन चीज़ों की हकीकत आप को बतलाए देता हूँ जिन पर आप से सब्र न हुवा. जो कश्ती थी वह चन्द आदमियों की थी जो (इसके ज़रीए) इस दरया में मेहनत (मजदूरी) करते थे सो मैं ने चाहा कि इसमें ऐब डाल दूं और (वजेह इसकी ये थी कि) इन लोगों के आगे की तरफ़ एक (ज़लिम) बादशाह था जो हर (अच्छी) कश्ती को ज़बरदस्ती पकड़ रहा है. और रहा वह लड़का तो उसके माँ बाप ईमान दार थे सो हमको अंदेशा (यानी तहकीक) हुवा कि ये इन दोनों पर सर कशी और कुफ्र का असर न डाल दे. पस हम को ये मंज़ूर हुवा कि बजाए इसके कि इनका परवर दिगार इनको ऐसी औलाद दे जो पाकीज़गी (यानी दीन) में इस से बेहतर हो और( माँ बाप के साथ) मुहब्बत करने में इस से बेहतर हो. और रही दीवार, सो वह दो यतीम बच्चों की थी जो इस शहर में (रहते) हैं और उस (दीवार) के नीचे उन का कुछ माल मदफून था (जो उनके बाप से मीरास में पहूंचा है) और उनका बाप (जो मर गया) एक नेक आदमी था. सो आप के रब ने अपनी मेहरबानी से चाहा कि वह दोनों अपने जवानी (की उम्र) को पहुँचें और अपना दफीना निकल लें. आपके रब की रहमत से और (ये सारे काम मैं ने ब-अल्हाम इलाही किए हैं इन में से) कोई काम मैं ने अपनी राय से नहीं किया. लीजिए ये है हक़ीक़त इन (बातों) की जिन पर आप से सब्र न हो सका। ''


सूरह कुहफ १८ - पारा १५ आयत (५९-८२)



इस क़िस्से पर गौर करें ? ? ?मछली गोया परिंदा थी बगैर पर पैर की कहानी - - -


''अपनी मछली को दोनों भूल गए और उस (मछली) ने अपनी राह ली और चल दी''इस्लामी शैतान ने अपना काम गुमराह करने का मछली गुमा कर, कर दिया।''


ब्रेकेट में तर्जुमा निगार मौलाना शौकत अली थानवी द्वारा भरे अलफ़ाज़ हैं जो मुहम्मद की ज़ुबान दानी को मुकम्मल करते है.मुहम्मद के पास इतना भी सलीक़ा न था के ढंग से बात कर पाते, यह तहरीर गवाह है.चोर डाकू नहीं बल्कि - - -


'' आगे की तरफ़ एक (ज़लिम) बादशाह था जो हर (अच्छी) कश्ती को ज़बरदस्ती पकड़ रहा है।


कहानी में उस शख्स का नाम भी नहीं है जो मूसा की रहनुमाई करता है, थानवी ने अपनी तरफ से (यानी खिज़िर) जोड़ कर अल्लाह की मदद कर दिया है।


मूसा की रहनुमाई करने वाले की हरकत गौर तलब है कि अंदेशा के तहत लड़के का खून कर दिया, थानवी को इसे ईश वाणी कर देने में कोई परहेज़ नहीं, अल्लाह के गुरू जो ठहरे. अंदेशा - - -


(यानी तहकीक) इस तरह अल्लाह की इस्लाह किया है.चोर डाकू नहीं बल्कि - - - '' आगे की तरफ़ एक (ज़लिम) बादशाह था जो हर (अच्छी) कश्ती को ज़बरदस्ती पकड़ रहा है।


बोसीदा दीवार जो गिर रही है को हाथ से रोक दिया और वह रुक भी गई, यही नहीं बच्चों के बड़े होंने तक रुकी रहेगी और गड़े दाफीने का पता भी बतलाएगी। मुहम्मद की अक़ली उड़ान कितनी सतही थी।


मुसालमानों! बूढी दादी की कहानियों में तो कुछ दम होता था कि बच्चे कान लगा कर सुनते थे, मुहम्मद के क़िस्से गोई में तो इतना भी दम नहीं जो तुम अपनी इबादत में भुनभुनाते हो।


जागो मोमिन जगा रहा है जिसे तुम्हारी फ़िक्र है कि तुम्हारे ऊपर इस्लामी अज़ाब के बादल मंडरा रहे हैं. काल कोठरी से बहार निकलो नई फ़िज़ा तुम्हारा इंतज़ार कर रही है, तुम्हारे भीतर जो अल्लाह का खौफ है वैसा कोई अल्लाल नहीं है, वह मुहम्मदी शैतान है. अल्लाह अगर है तो तुम्हारे बाप की तरह होगा, जो चाहता है कि उसकी औलादें इल्म जदीद को हासिल करके डाक्टर, इंजीनियर और साइंटिस्ट बनें और उसकीराह में इस्लाम बाधक है।



जीम 'मोमिन' निसरुल-ईमान


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ज़माना गवाह है - - -



The fabricated Alexander the Great said, Qur'an 18:96 "'Bring me (blocks) of iron.' then, when he had filled up the gap between the two mountainsides, he said, 'Blow.' Then when he had made them (red) as fire [by blowing on an iron wall], he said: 'Bring me molten lead-copper-brass to pour over them. Thus Gog and Magog were made powerless to scale it or dig a hole in it. (Dhu'l-Qarnain) said: 'This is a mercy from my Lord. But when the promise of my Lord comes to pass, He will make it into dust; and the promise of my Lord is ever true.' On that day (the day of Gog and Magog will come out) We shall leave them to surge like waves on one another: the trumpet will be blown, and We shall collect them (the creatures) all together in one gathering in conflict. And We shall present Hell that day for disbelievers to see, all spread out in plain view.... Verily We have prepared Hell for the hospitality of the Infidels; Hell is for the disbeliever's entertainment." At least Allah hasn't lost his touch. He remains the most devilishly demonic deity ever devised. But then I suppose a god who would call hell "entertainment," is a perfect match for a warlord who entertains himself torturing men and raping women.Qur'an 18:103 "Say: 'Shall we inform you of who will be the greatest losers? ...Those who reject my Revelations... Hell is their reward, because they rejected Islam, and took My proofs, verses, and lessons, and those of My Messengers by way of jest in mockery.'" In all fairness, it's pretty hard not to mock such foolishness.There is a Magog Hadith, too: Bukhari:V9B88N249 "One day Allah's Apostle entered upon her in a state of fear and said, 'None has the right to be worshipped but Allah! Woe to the Arabs from the Great evil that has approached (them). Today a hole has been opened in the dam [Alexander's iron barrier between the mountains] of Gog and Magog like this.' The Prophet made a circle with his index finger and thumb. Zainab added: I said, 'O Allah's Apostle! Shall we be destroyed though there will be righteous people among us.' The Prophet said, 'Yes, if the (number) of evil (persons) increases.'" Somebody had a very rich imagination - one might even call it hallucinogenic.Enough with the fairytale. According to the Bible, Islam will lead to the destruction of much of the world. I share this with you so that you might appreciate the cost of tolerating the terrorist dogma rather than freeing Muslims from it. And equally important, I want you to be prepared for what is to come, because while it will happen, millions can be saved from it.I know the future because - unlike Muhammad - Isaiah, Daniel, Ezekiel, and John were real prophets. By putting their predictions together, one can reasonably deduce that six thousand years after Adam and Eve made the wrong choice, Yahweh will put an end to man's destructive deceptions, false prophets, ignorance, and sin. He wants to establish a new world order, one without deceit, disease, death, or damnation.Yet, true to his character and purpose, he wants the final choice to remain ours, not his. Yahweh simply removes his spirit from the earth, enabling those who remain to plot their own course. Totally separated from God, the prophets predict, humanity will choose poorly. The world will plummet into chaos.The story of Islam's ultimate demise is but one of many tragic tales that collectively make up what the Bible calls the "Tribulation" - the last seven years of man's rule on planet earth। Isaiah, in addition to writing about the arrival and nature of the Messiah, was inspired by Yahweh to foretell how Lucifer would form Islam. Then he predicted the events that would lead the Nation of Islam to attack Israel, engulfing the world in war. Daniel explains that it will begin, as did World War II, with a "peace treaty." Foolishly, the world trusts nations whose official god and prophet order them to disavow such oaths. As a result, a third of the earth's surface is scorched (Revelation 8:7), a quarter of its people die (Revelation 6:8) - including the annihilation of five out of every six Muslims (Ezekiel 39:2). I want to provide you with an overview of this battle so that you might be saved from its devastation.
Prophet of Doom



27 comments:

  1. प्रिय मित्र
    नमस्ते
    आपने जो मुहम्मद वा अन्य मौलानावो क़े बारे में लिखा है वह बहुत ही ज्ञान बर्धक है मैंने भी कुरान पढ़ी है लेकिन मै इतनी जानकारी हासिल नहीं कर सका आपकी पोस्ट से बहुत जानकारी हुई है मुझे एक कहानी याद आती है मै उसे लिखना चाहता हू .
    एक ब्यक्ति की किन्ही कारणों से नाक काट ली गयी थोड़ी ही देर में वह जोर-जोर से हसने लगा,लोगो ने पूछा कि आखिर यह क्यों हस रहा है फिर धीरे -धीरे उसने बताया कि उसे भगवान दिखाई दे रहा है मुझे दर्शन हो रहा है लोगो ने पूछा कैसे नक कटे ने उत्तर दिया कि ये नाक ही इश्वर क़े दर्शन बाधा है देखते -देखते बहुत लोग उससे प्रभावित होकर नाक कटानी शुरू करदी जिसकी नाक कट जाती उसे वह समझाता कि देखो अब तो नाक काट ही गयी है अब अपनी संख्या बढाओ और इस प्रकार धीरे-धीरे एक नक् कटा संप्रदाय तैयार हो गया .
    भाई छमा करना यह पोस्ट पढने क़े बाद मुझे ऐसा ही लगा इस नाते मैंने यह कहानी लिखी.

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  2. अल्लाह अगर है तो तुम्हारे बाप की तरह होगा, जो चाहता है कि उसकी औलादें इल्म जदीद को हासिल करके डाक्टर, इंजीनियर और साइंटिस्ट बनें'
    yah bilkul sahI likha hai..

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  3. इन बेतुकी बातों को अल्लाह का संदेश मानने वाले,अपने इन्सान होने का कुछ तो सबूत दे,कुछ तो अक्ल लगा कर शक़ करे,उन संदिग्ध आदेशो पर!!
    ये लोग तो इतने भयभीत है,कि अन्धे बन कर अक्ल से ही तौबा किये हुए है। शक़-समाधान की जगह अन्धविश्वास में गर्क है,

    एक बात बताईए,'मोमिन'साहब,
    स्पष्टतया हिंसक बातों,जेहादी आदेशों के बावज़ुद,ये कट्टर मुस्लिम किस आधार पर कुरआन व इस्लाम को 'अमन का पैगाम'कहते हैं। अल्लाह को न मानने वालों को खत्म करने की प्रेरणा स्वयं अल्लाह देता हैं, तो किस तरह ये शान्ति फ़ैलाना चाहते है? सभी को (चिर)शान्त करके?
    कुरआन में अमन के लिये कितना विशिष्ट,विस्तरित,विवादरहित त्यागमय शान्ति का सन्देश छुपा हुआ है,कुछ प्रकाश डालिये।

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  4. @सुज्ञ जी,
    कुरआन की शान्ति का पैगाम देती हुई आयतें :
    [2:256] दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और अल्लाह ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है
    [2:272] (ऐ रसूल) उनका मंज़िले मक़सूद तक पहुँचाना तुम्हारा काम नहीं (तुम्हारा काम सिर्फ़ रास्ता दिखाना है) मगर हॉ अल्लाह जिसको चाहे मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा दे
    [7:56] (लोगों) अपने परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर और चुपके - चुपके दुआ करो वह हद से तजाविज़ करने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता और ज़मीन में असलाह के बाद फसाद न करते फिरो और (अज़ाब) के ख़ौफ से और (रहमत) की आस लगा के अल्लाह से दुआ मांगो
    [2:11-12] और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो (तो) कहते हैं कि हम तो सिर्फ इसलाह करते हैं. ख़बरदार हो जाओ बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं .
    [88:21-22] तो तुम नसीहत करते रहो तुम तो बस नसीहत करने वाले हो. तुम कुछ उन पर दरोग़ा तो हो नहीं
    [109:5-6] और जिसकी मैं इबादत करता हूँ उसकी तुम इबादत करने वाले नहीं. तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन
    [9:6] और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं

    क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग दो)

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  5. ज़ीशान साहब,

    जानकारी के लिये शुक्रिया!
    और जानना चाहता हुं,इसके अलावा भी अमन पर ज़्यादा ज़ोर देनें वाली आयतें है?अथवा यह सात आयतें मुख्य है?इन सातों में वह प्रमुख आयत कौनसी है,जिस के आधार पर इस्लाम का अमन के पैगाम का दावा है। और उसे मूल रूप (शब्दसः अनुवाद,अनुवादक के मन्तव्य रहित)प्रस्तूत करें।

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  6. 'मोमिन'साहब,

    इस चर्चा मे,सत्य तक पहुंचने में आप भी सह्योग करें

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  7. @सुज्ञ जी,
    मैंने उदाहरण के लिए कुछ आयतें पेश की थीं, वरना हैं तो बहुत सी आयतें. जैसे की :
    [4 : 80] जिसने रसूल की इताअत की तो उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ खयाल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है
    [6 : 107] और अगर अल्लाह चाहता तो ये लोग शिर्क ही न करते और हमने तुमको उन लोगों का निगेहबान तो बनाया नहीं है और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो
    [10 : 99&100] और (ऐ पैग़म्बर) अगर तेरा परवरदिगार चाहता तो जितने लोग रुए ज़मीन पर हैं सबके सब इमान ले आते तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो ताकि सबके सब इमानदार हो जाएँ हालॉकि किसी शख्‍स को ये इखतियार नहीं कि बगै़र अल्लाह की इजाज़त ईमान ले आए और जो लोग अक़ल से काम नहीं लेते उन्हीं लेागें पर अल्लाह गन्दगी डाल देता है
    [11 : 28] (नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ
    [16 : 82] तुम उसकी फरमाबरदारी करो उस पर भी अगर ये लोग (इमान से) मुँह फेरे तो तुम्हारा फर्ज़ सिर्फ (एहकाम का) साफ पहुँचा देना है
    [17 : 53&54] और (ऐ रसूल) मेरे (सच्चे) बन्दों (मोमिनों से कह दो कि वह (काफिरों से) बात करें तो अच्छे तरीक़े से (सख्त कलामी न करें) क्योंकि शैतान तो (ऐसी ही) बातों से फसाद डलवाता है इसमें तो शक ही नहीं कि शैतान आदमी का खुला हुआ दुश्मन है
    [21 : 107 & 109] और (ऐ रसूल) हमने तो तुमको सारे दुनिया जहाँन के लोगों के हक़ में अज़सरतापा रहमत बनाकर भेजा-----फिर अगर ये लोग (उस पर भी) मुँह फेरें तो तुम कह दो कि मैंने तुम सबको यकसाँ ख़बर कर दी है और मैं नहीं जानता कि जिस (अज़ाब) का तुमसे वायदा किया गया है क़रीब आ पहुँचा या (अभी) दूर है
    [22 : 67] इसमें शक नहीं कि इन्सान बड़ा ही नाशुक्रा है (ऐ रसूल) हमने हर उम्मत के वास्ते एक तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया कि वह इस पर चलते हैं फिर तो उन्हें इस दीन (इस्लाम) में तुम से झगड़ा न करना चाहिए और तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की तरफ बुलाए जाओ
    [24 : 54] (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही (तबलीग़) वाजिब है जिसके वह ज़िम्मेदार किए गए हैं और जिसके ज़िम्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर (एहकाम का) पहुँचाना फर्ज़ है
    [36 : 16&17] तब उन पैग़म्बरों ने कहा हमारा परवरदिगार जानता है कि हम यक़ीन्न उसी के भेजे हुए (आए) हैं और (तुम मानो या न मानो) हम पर तो बस खुल्लम खुल्ला एहकामे अल्लाह का पहुँचा देना फर्ज़ है
    [39 : 41] (ऐ रसूल) हमने तुम्हारे पास (ये) किताब (क़ुरआन) सच्चाई के साथ लोगों (की हिदायत) के वास्ते नाज़िल की है पस जो राह पर आया तो अपने ही (भले के) लिए और जो गुमराह हुआ तो उसकी गुमराही का वबाल भी उसी पर है और फिर तुम कुछ उनके ज़िम्मेदार तो हो नहीं
    [42 : 6] और जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़ कर (और) अपने सरपरस्त बना रखे हैं अल्लाह उनकी निगरानी कर रहा है (ऐ रसूल) तुम उनके निगेहबान नहीं हो
    [42 : 48] फिर अगर मुँह फेर लें तो (ऐ रसूल) हमने तुमको उनका निगेहबान बनाकर नहीं भेजा तुम्हारा काम तो सिर्फ (एहकाम का) पहुँचा देना है और जब हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह उससे ख़ुश हो जाता है और अगर उनको उन्हीं के हाथों की पहली करतूतों की बदौलत कोई तकलीफ पहुँचती (सब एहसान भूल गए) बेशक इन्सान बड़ा नाशुक्रा है
    [64 :12] और अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो फिर अगर तुमने मुँह फेरा तो हमारे रसूल पर सिर्फ़ पैग़ाम का वाज़ेए करके पहुँचा देना फर्ज़ है
    [60 : 8&9] जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से अल्लाह तुम्हें मना नहीं करता बेशक अल्लाह इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है. अल्लाह तो बस उन लोगों के साथ दोस्ती करने से मना करता है जिन्होने तुमसे दीन के बारे में लड़ाई की और तुमको तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया और तुम्हारे निकालने में (औरों की) मदद की और जो लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे वह लोग ज़ालिम हैं
    अल्लाह का पहला उद्देश्य यही है की ज़मीन पर फसाद न फैले, और इसके लिए वह अपने नबी को भी बार बार ताकीद कर रहा है.

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  10. ज़ीशान साहब,
    स्पष्ठ रूप से मात्र शान्ति की आयत तो नहिं दिखती,हां अल्लाह चाह्ता नहिं था ज़मीन पर फसाद फैले। शायद बात बात पर लडने वालों को ताक़िद किया है,और शायद वहां यह सामान्य हो।
    खैर,पर यह आयत बहुत कुछ कह जाती है:
    "और (ऐ पैग़म्बर) अगर तेरा परवरदिगार चाहता तो जितने लोग रुए ज़मीन पर हैं, सबके सब इमान ले आते। तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो? ताकि सबके सब इमानदार हो जाएँ? हालॉकि किसी शख्‍स को ये इखतियार नहीं कि बगै़र अल्लाह की इजाज़त ईमान ले आए। और जो लोग अक़ल से काम नहीं लेते उन्हीं लेागें पर अल्लाह गन्दगी डाल देता है"[10 : 99&100]

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  11. @सुज्ञ जी,

    मक्के में कथित काफिरों के निशाने पर आ जाने के वक़्त मुहम्मद ने काफिरों से सुलह करके मुआहिदा किया था तब कुरआन की यह आयत ''लकुम दीनाकुम वाले यदीन'' मुहम्मद के मुंह में आई जिसका मतलब हुआ ''तुहारा दीन तुम्हारे लिए है, हमारा हमारे लिए है .''मगर फफिरों के नारगे से निकलते ही सुलह किए हुए मुआहिदा को तोड़ दिया और सूरह तौबा नाज़िल कर दिया जो अल्लाह के नाम से शुरू नहीं होती कि इसमें मुआहिदा शिकनी है, बाक़ी तमाम ११३ सूरह ''बिस्मिल्ला हिररहमा निररहीम'' से शुरू हुई हैं, इसे छोड़ कर . सूरह तौबा कथित आयत से तौबा है जिसको मुल्ला हर जगह उछाला करते हैं, ऐसे ही आयतें हैं जिनका ज़िक्र मियाँ ज़ीशान कर रहे हैं वह सब आपस में मुसलामानों से मुसलामानोंके लिए हैं.
    पहले भी मैं ने अल्लाह की आयतें बयान की हैं फिर भी सूरह तौबा में अल्लाह कहता है - - -
    ''अल्लाह की तरफ से और उसके रसूल की तरफ से उन मुशरिकीन के अह्द से दस्त बरदारी है, जिन से तुमने अह्द कर रखा था.''
    सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (१)
    ''सो जब अश्हुर-हुर्म गुज़र जाएँ इन मुशरिकीन को जहाँ पाओ मारो और पकड़ो और बांधो और दाँव घात के मौकों पर ताक लगा कर बैठो. फिर अगर तौबा करलें, नमाज़ पढने लगें और ज़कात देने लगें तो इन का रास्ता छोड़ दो,'''
    सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (५)
    ''ऐ ईमान वालो! अपने बापों को, अपने भाइयों को अपना रफ़ीक़ मत बनाओ अगर वह कुफ़्र को बमुक़बिला ईमान अज़ीज़ रखें और तुम में से जो शख्स इनके साथ रफ़ाक़त रखेगा, सो ऐसे लोग बड़े नाफ़रमान हैं''
    सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (२३)
    '' लोग चाहते हैं कि अल्लाह के नूर को अपने मुंह से फूँक मार के बुझा दें ,हालाँकि अल्लाह तआला बदून इसके अपने नूर को कमाल तक पहुँचा दे , मानेगा नहीं, गो काफ़िर लोग कैसे ही नाखुश हों.''
    सूरात्तुत तौबा ९ - १०वाँ परा आयत (३२)
    क्यूंकि - - -
    ''बिला शुबहा अल्लाह तअला ज़बरदस्त हिकमत वाले हैं''
    सूरह -इंफाल - ८ नौवाँ परा आयत (१०)
    आज कल मौलानाओं का यही रवय्या है जो मियां जीशान अख्तियार किए हुए हैं और दूसरों को बच्चा समझते हैं.इनके हक में है कि सच्चाई पर आएं .

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  12. @सुज्ञ जी,
    मोमिन मियाँ का कहना है की उपरोक्त आयतें जो मैंने बताईं वह मुसलमानों से मुसलमानों के लिए हैं. आप ईमानदारी से बताएं क्या यह आयतें मुसलमानों से मुसलमानों के लिए हैं?
    [60 : 8 &9] जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से अल्लाह तुम्हें मना नहीं करता बेशक अल्लाह इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है. अल्लाह तो बस उन लोगों के साथ दोस्ती करने से मना करता है जिन्होने तुमसे दीन के बारे में लड़ाई की और तुमको तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया और तुम्हारे निकालने में (औरों की) मदद की और जो लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे वह लोग ज़ालिम हैं
    [4 : 80] जिसने रसूल की इताअत की तो उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ खयाल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है
    [6 : 107] और अगर अल्लाह चाहता तो ये लोग शिर्क ही न करते और हमने तुमको उन लोगों का निगेहबान तो बनाया नहीं है और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो.
    इसका मतलब साफ़ है की अगर कोई तुमसे झगडा नहीं कर रहा है तो तुम्हें उससे झगड़ने या उसे तकलीफ पहुंचाने का कोई हक नहीं. मोमिन मियाँ ने दीने इस्लाम लगता है किसी तालिबानी मुल्ला से पढ़ा है, वरना वह ऐसी बातें हरगिज़ न कहते.
    अब बात करते हैं सुलह की जो मोहम्मद (स.अ.) ने मक्के के काफिरों से की थी, उस सुलह के नियमों की अवहेलना मक्के वाले खुले आम कर रहे थे और मुसलमानों को परेशान कर रहे थे. उसके बाद सूरे तौबा नाजिल हुई. हर कानून में IF - Then होता है. मोमिन मियाँ इस सूरे की 1, 5, 23 आयत तो पढ़ रहे हैं लेकिन आयत नं 12, 13 और 6 पढना भूल गए या टाल गए,
    [तौबा आयत नं 12] और अगर ये लोग एहद कर चुकने के बाद अपनी क़समें तोड़ डालें और तुम्हारे दीन में तुमको ताना दें तो तुम कुफ्र के सरवर आवारा लोगों से खूब लड़ाई करो उनकी क़समें का हरगिज़ कोई एतबार नहीं ताकि ये लोग (अपनी शरारत से) बाज़ आएँ.
    [तौबा आयत नं 13] (मुसलमानों) भला तुम उन लोगों से क्यों नहीं लड़ते जिन्होंने अपनी क़समों को तोड़ डाला और रसूल को निकाल बाहर करना (अपने दिल में) ठान लिया था और तुमसे पहले छेड़ भी उन्होंने ही शुरू की थी क्या तुम उनसे डरते हो तो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो अल्लाह उनसे कहीं बढ़ कर तुम्हारे डरने के क़ाबिल है.
    यानी अगर कोई तुमसे लड़ता है तो ज़रूर लड़ो. क्या सेल्फ डिफेंस भारतीय कानून में नहीं है?
    इसी सूरे की देखिये आयत अमन पसंद गैर मुस्लिमों के बारे में क्या कहती है
    [तौबा आयत नं 9]
    और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं.

    सुज्ञ जी, अब फैसला आपके हाथ में है.

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  13. ज़ीशान साहब,

    फ़ैसला तो हमें अन्तर आत्मा की गवाही से ही मन्जूर है।
    हमारी व आपकी मूल दार्शनिक मान्यता में ही गज़ब का अंतर है।
    हम भले कितनी ही वकालत करलें कि सभी धर्म समान है,सभी में अच्छे उपदेश दिये गये है। पर में निश्चय के साथ कह सकता हुं,समानता जैसा कुछ नहिं होता, जब मूल ध्येय ही विरोधार्थी हो।
    या इतने अस्प्ष्ठ कि उन्हे मनमर्ज़ी तोडा मरोडा जा सके।
    [तौबा आयत नं 9] को ही 'अमन का पैगाम' के लिये प्रमुखता से कोट करते हो, और यहां शर्तों पर ही शन्ति है।
    और समस्त भारतिय दर्शनों में किसी भी श्रेष्ठ गुणों को शर्तों के साथ नहीं अपनाया जाता। यहां तो क्षमा करने वाला,क्षमा से पहले सामने वाले के दुर्गुण भी गिनाये तो उसे सच्ची क्षमा नहिं माना जाता।
    आपने सही कहा,इस्लाम में राजनैतिक कानूनों की तरह IF - Then होता है.और भारतिय दर्शनों में शान्ति,तो फ़िर सर्वांग,सम्पूर्ण शान्ति। अन्तिम उद्देश्य आत्मा के अक्षय सुख का होता है।
    अतः समस्या "मूल में ही भूल" की है।

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  14. @सुज्ञ जी,
    दुनिया के हर कानून में IF-Then होता है. किसी को फांसी पर तभी चढ़ाया जाता है जब उसने उस तरह का कोई जुर्म किया हो. क्या आप बिना IF-Then श्रीमद्भागवत गीता के इस कानून को लागू कर देंगे?
    (अध्याय २ श्लोक ३१, ३२, ३३) तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है. अर्थात तुझे भय नहीं करना चाहिए. क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई दूसरा कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है.
    अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं.
    किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा.
    (सूरे तौबा की आयतें भी कुछ इसी से मिलती जुलती हैं.)
    आप बताएं की भारतीय दर्शनों में लाख शान्ति हो, इसके बावजूद देवों और असुरों के बीच संग्राम क्यों हुए? रामायण और महाभारत के युद्ध क्यों हुए?
    कुरआन की सूरे तौबा युद्धकाल की बात कर रही है. जबकि युद्ध ज़ोरों पर है, इसके बावजूद अगर शत्रु पनाह मांगता है तो उसे पनाह देने और सुरक्षित उसके घर पहुंचाने की बात आयत नं. 9 कर रही है. इससे ज्यादा अमन का पैगाम और क्या हो सकता है?

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  15. ज़ीशान साहब,
    अवश्य श्रीमद्भागवत गीता के इस कानून को लागू कर देंगे।
    आप अभी तक जानते ही नहीं क्षत्रियधर्म क्या होता है,केवल धर्म शब्द देखकर उतावले हो जाते है।
    आज देश की सेना क्षत्रिय है, और उसके लिये आज भी यही धर्म है।
    अर्थात तुझे भय नहीं करना चाहिए. क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई दूसरा कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है.'धर्मयुक्त युद्ध'
    से यहां तात्पर्य 'जेहाद'जैसा नहिं, बल्कि ऐसा युद्ध जो नितीनियमों से कर्तव्यों के लिये लडा जाय, जो क्षत्रियोचित हो।
    खैर, मैं गीता का बचाव नहिं कर रहा,उसमें भी कई हिंसात्मक उपदेश हो सकते है,जरूरी नहिं हम अन्धे बनकर गीता का हुबहू पालन करने लगें। पर गीता का उपरोक्त कथन सही है,क्षत्रिय को अपने क्षत्रियधर्म का पालन करना श्रेयकर है।
    भारतीय दर्शन मानवों और पूरी जीवसृष्टि के लिये ज्ञानियों द्वारा कहा गया है। ईश्वर द्वारा भेजा गया नहिं,ईश्वर को समझा गया है। ये देव-दानव आपस में लड पडे तो दर्शन क्या करे,इन लडाईयों को अनुकरणिय धर्म नहिं कहा है,लेकिन इतिहास के रूप में शास्त्रों में संजोया गया है। देव और ईश्वर अलग अलग है,कहीं कहीं तो देवताओं को मानवों से कमतर आंका गया है,धर्म-कर्म में मानव ही समर्थ है।
    देवताओं में मान,माया,लोभ,क्रोध जैसी बुराईयां पायी जाती है,परन्तु देवों का अपमान करना पाप है। भले आप गुणगान न कर सकें।

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  16. @सुज्ञ जी,
    आपने कहा की 'धर्मयुक्त युद्ध' से यहां तात्पर्य 'जेहाद'जैसा नहिं, बल्कि ऐसा युद्ध जो नितीनियमों से कर्तव्यों के लिये लडा जाय,।
    तो फिर जेहाद को आप क्या समझ रहे हैं? जेहाद भी कर्तव्यों की पूर्ती के लिए ही तो होता है.
    कभी कभी शान्ति स्थापित करने के लिए भी युद्ध करना पड़ता है. निश्चित रूप से शान्ति सभी को पसंद होती है. लेकिन अगर कोई आपके घर में घुसकर आपके घरवालों के साथ दुर्व्यवहार करे, तो क्या उस समय आप शान्ति की दुहाई देंगे? गीता और कुरआन के युद्ध सम्बन्धी उपदेश ऐसे ही वक़्त के लिए हैं. लेकिन अगर अधूरा कुरआन पढ़कर हम हर समय तलवार लेकर खड़े हो जाएँ और सबको मारने काटने लगें, तो हमसे बड़ा बेवक़ूफ़ कोई नहीं.

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  17. ज़ीशान साहब,
    हां,मैने कहा,धर्मयुक्त युद्ध' से यहां तात्पर्य 'जेहाद'जैसा नहिं, बल्कि ऐसा युद्ध जो नितीनियमों से कर्तव्यों के लिये लडा जाय,।
    फ़िर से दोहराता हुं,वह उपदेश ही मात्र क्षत्रियों के लिये था,समस्त मानवता के लिये नहिं।
    और आपके जेहाद को सामान्य युद्ध से नहिं धर्म से जोडा जाता है।
    जैसे गीता एक क्षत्रियों को सम्बोधित युद्धनीति है,वैसे ही कुरआन भी पूर्ण युद्धनीति ही है,हम यही तो कहना चाह्ते है। इसलिये आपका यह 'अमन का पैगाम' वस्तुतः युद्ध विराम व युद्धशान्ति है। और यह 'युद्ध विराम'तब तक है जब तक कथित शर्तें मान नहिं ली जाती।

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  19. @सुज्ञ जी
    अगर युद्धनीति मात्र क्षत्रियों के लिए है, तो मुझे बताइये अगर कोई दुश्मन आपकी किसी बस्ती पर हमला करता है और उस बस्ती में कोई क्षत्रिय नहीं है तो क्या बाकी लोग मूक दर्शक बने अपने और अपने घरवालों को लुटता हुआ देखते रहेंगे?
    अब ये बताइये की इसमें युद्ध विराम की कौन सी शर्त है:-
    [60 : 8] जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से अल्लाह तुम्हें मना नहीं करता बेशक अल्लाह इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है.

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  20. ज़ीशान साहब,

    आप अक्सर आकृमकता को जस्टिफ़ाय करने के लिये यही उदाह्रण पेश करते है। पता है क्यों?,क्योंकि आज के युग में सीधे आकृमण को सही नहिं कहा जाता,अतः आप स्वबचाव का आश्रय लेना चाहते है। और आपकी मुश्किल यह है कि धेर्य,समता,क्षमा,सहनशीलता आदि के मायने आप विचार तक नहिं पाते।
    आयत[60 : 8]वस्तुतः युद्ध विराम के बाद आपको कैसा व्यवहार करना है,उपदेशीत करती है। और अल्लाह का यह कथन "इन्साफ़ से पेश आने से अल्लाह तुम्हें मना नहीं करता" स्वयं दर्शाता है कि पहले कहीं कुछ 'मना' भी कहा गया है।

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  21. ये क्या पागलपन है एक तो जाकिर नाइक जिसके दिमाग में भूसा भरा है और ये दूसरा असरफअली है जिनका भी कोई स्क्रू ढीला लगता है एक को संस्कृत ठीक से नहीं आती और एक को अरबी का मतलब करना नहीं आता दोनों ही अपने अपने नाम का प्रचार करने में लगे है में कोई इस्लाम या मुसलमानों का विरोधी नहीं हूँ लेकिन ऐसे लोगो का विरोधी हूँ जो की किसी भी धर्म ग्रन्थ का अपमान करके अपने आप को बड़ा चतुर और समजदार बताते है इन लोगो की आदत होती है ये किसी भी धर्म ग्रन्थ का अध्ययन नहीं किया करते लेकिन ये धर्म ग्रन्थ इस लिए पढ़ते है की उसमे से कुछ ऐसा मसाले दार मतलब निकला जाये कि दुनिया अचंभित हो जाये ये सब दया के पात्र है और इनका साथ देनेवाले विकृत मनो विचार वाले कहलायेंगे (अगर जाकिर नाइक को संस्कृत और असरफ को अरबी उर्दू सीखनी है तो में सिखाने के लिया तैयार हु बिलकुल निःशुल्क ) चाणक्य के अनुसार मूर्खो से कोई भी सम्बन्ध रखने वाला अंत में संकट ही पाता है तो असरफ अली और जाकिर नाइक ये दोनों को एक दुसरे पर कीचड़ उछालना है तो उछाले लेकिन इनके पास खड़े रह कर अपने ऊपर भी किचल उचालेंगा ये तय है तो इनसे दूर ही रहा जाये यही बुध्धिमानी है असरफ अली मुस्लिम हो कर मुस्लिम के उपास्यो को निचा दिखा रहा है तो क्या ये दुसरे धमो की इज्जत करेगा ? इनसे पूछो की फिर किसकी उपासना की जाये? क्या तुम लोगो की ? इससे पूछना भी बेकार होगा की, तुम्हारे स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बारेमे क्या विचार है? या तो गरीब नवाज़ के बारे में क्या विचार है? विवेकानंद के बारेमे या तो सूफी संत निजामुदीन के बारेमे? कबीर, तुलसीदास, मीराबाई के बारे में ?क्यों की ये दोनों बकवास ही करने वाले है. मैं तो हिन्दू, जैन, बुद्ध, सिख, इसाई और सबको इनसे दूर ही रहने की सलाह देता हूँ . - श्री दासअवतार

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  22. Allah says in the quran at not less than diffrent three places that: It is He who has sent His Messenger with guidance and the religion of truth to manifest it over all religion, although they who associate others with Allah dislike it.(9:33,48:28,61:9)
    And for your knowledge brother this is what happening in the world.The fastest growing religion is Islam in the world according to the world's stats..
    regarding what you have written ..i can only say that you have read the quran with the intention of insulting our beloved prophet muhammed and islam..so shaitan has put these thoughts into your mind..i pray to Allah that he show his straight path to you and guide you otherwise you will be thrown into the hell fire for your words that u have written about THE GLORIOUS QURAN..

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  24. Please Have an Answer for 3 Question for whole the Life, 1. Who born you ? 2. Why have you borned (What is your job) ? 3. For which cause you are borned, how can you do the job ?

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  25. Please Have an Answer for 3 Question for whole the Life, 1. Who born you ? 2. Why have you borned (What is your job) ? 3. For which cause you are borned, how can you do the job ?

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